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Zee जानकारी : लोगों ने भारी डिस्काउंट के लालच में खरीदे लाखों ज़हरीले वाहन

नई दिल्ली : सबसे पहले मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं। सवाल ये है कि अगर आपको कोई ज़हर भारी डिस्काउंट पर मिलने लगे तो क्या आप उसे खरीदेंगे? मुझे पूरा यकीन है कि आपमें से कोई भी ऐसा नहीं होगा जिसका जवाब हां में हो। लेकिन सच ये है कि हमारे देश में लोग भारी डिस्काउंट के लालच में ऐसा सामान भी खरीद लेते हैं। जो लाखों लोगों की मौत की वजह बनता है। हम BS-3 तकनीक पर आधारित वाहनों की बात कर रहे हैं। BS-3 तकनीक पर आधारित वाहनों को वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन आज देश भर के लोगों ने भारी डिस्काउंट के लालच में लाखों ज़हरीले वाहन खरीद लिए हैं।

दरअसल, 29 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि पूरे भारत में 1 अप्रैल 2017 से BS-3 तकनीक पर आधारित कोई भी वाहन ना तो बेचा जाएगा और ना ही उसका रजिस्ट्रेशन होगा।

BS का मतलब होता है – भारत स्टेज. ये इमीशन का एक मानक है। जिससे तय होता है कि कोई वाहन कितना प्रदूषण फैलाता है। अभी तक भारत में दिल्ली-NCR के अलावा सिर्फ 13 शहर ऐसे हैं जहां BS 4 से नीचे के मानकों पर आधारित वाहन बेचना गैरकानूनी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 1 अप्रैल से देश के किसी भी शहर में BS 3 वाहनों की बिक्री बंद हो जाएगी। भारत में इमीशन के लिए भारत स्टेज मानकों की शुरुआत वर्ष 2000 में हुई थी। और तब से लेकर अब तक BS-1, BS-2, BS-3 और BS 4 मानकों पर आधारित वाहन बाज़ार में आ चुके हैं। 

भारत स्टेज…इमीशन के यूरोपीयन रेगुलेशंस पर आधारित है। आपको बता दें कि अमेरिका और यूरोप के देशों में जो नए वाहन बेचे जा रहे हैं वो यूरो 6 तकनीक पर आधारित हैं। यानी भारत से दो कदम आगे। आपको जानकर हैरानी होगी कि यूरोप में इमीशन के मानक के तौर पर यूरो 6 की शुरुआत वर्ष 2014 में ही हो गई थी। जबकि भारत में BS-6 वाहनों के लिए डेडलाइन वर्ष 2020 रखी गई है। यानी जब तक भारत BS-6 तक पहुंचेगा तब तक यूरोप में ऐसे वाहन आने लगेंगे जो नाम मात्र का प्रदूषण फैलाते हैं। 

यहां आपको ये जानकारी भी दे दें कि BS-6 से पहले BS -5 मानक लाए जाने की तैयारी थी लेकिन बढ़ते प्रदूषण के देखते हुए इसे स्किप कर दिया गया है। यानी BS-4 के बाद भारत में सीधे BS-6 लाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ऑटोमोबाइल कंपनियों को BS-3 वाहनों से जुड़ी 1 अप्रैल 2017 की डेडलाइन के बारे में पता था। जबकि कंपनियों का कहना है कि उन्हें सिर्फ इस बात की जानकारी थी 1 अप्रैल 2017 से उन्हें BS-3 वाहनों का उत्पादन नहीं करना है। 

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने से पहले कंपनियों के स्टॉक में BS-3 पर आधारित वाहनों की संख्या लगभग 9 लाख थी। सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैनुफैक्चरर्स के मुताबिक इन वाहनों की कुल कीमत करीब 12 हज़ार करोड़ रुपये है। ज़ाहिर है भारत में कंपनियां लोगों की जान की कीमत पर भी नुकसान नहीं उठाना चाहती हैं। इसलिए कंपनियों ने 31 मार्च की डेडलाइन खत्म होने से पहले इन वाहनों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। इसके लिए इन कपंनियों ने ग्राहकों को भारी डिस्काउंट का लालच दिया। आज भी देश के बड़े बड़े अखबारों में ऑटोमोबाइल कंपनियों ने पूरे पन्ने के विज्ञापन दिए। 
इन विज्ञापनों के ज़रिए लोगों को बताया गया कि अगर वो आज वाहन खरीदेंगे तो उन्हें 12 हज़ार 500 रुपये से लेकर 22 हज़ार रुपये तक की छूट दी जाएगी। लेकिन इन कंपनियों ने इन विज्ञापनों में ये कहीं नहीं लिखा कि ये छूट इसलिए दी जा रही है क्योंकि उनके वाहन BS-3 पर आधारित है। कंपनियां जानती थीं कि अगर ये वाहन नहीं बिके तो कल से इनकी कोई कीमत नहीं रह जाएगी।

कंपनियों ने नवरात्रि के डिस्काउंट के नाम पर ये ऑफर्स आम लोगों को दिए और लोगों ने भी सुबह से ही शोरूम्स के बाहर लाइनें लगाना शुरू कर दिया। हमारी टीम ने जब दिल्ली के एक शोरूम के मालिक से बात की तो उसनें हमें बताया कि उसके शोरूम में 40 दोपहिया वाहन थे और आज ये 40 वाहन सिर्फ 40 मिनट में बिक गए। ऐसा सिर्फ दिल्ली में नहीं, देश के कई छोटे-बड़े शहरों में बड़े पैमाने पर हुआ।

यानी कंपनियों के इस अनैतिक डिस्काउंट के चक्कर में लोगों ने वो वाहन खुशी-खुशी खरीद लिए जो मानकों से ज़्यादा प्रदूषण फैलाएंगे और आने वाले समय में भारत में लाखों लोगों की जान ले लेंगे।  

मशहूर जर्नल द लैंसेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वायु प्रदूषण से हर साल 10 लाख लोगों की मौत होती है। सबसे ज्यादा लोगों की जान प्रदूषण के PM 2.5 कणों की वजह से जाती है। IIT कानपुर की एक स्टडी के मुताबिक PM 2.5 कणों के प्रदूषण में वाहनों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत है। यानी सीधा गणित लगाया जाए तो भारत में 2 लाख लोग वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण की वजह से मारे जाते हैं। आज कंपनियों ने BS-3 तकनीक पर आधारित जिन 9 लाख वाहनों को बेचने की कोशिश की है। वो सिर्फ वाहन नहीं बल्कि दो और चार पहियों पर दौड़ने वाला ज़हर है। इन वाहनों में 96 हज़ार से ज्यादा कॉमर्शियल वाहन, 6 लाख 71 हज़ार से ज्यादा टू ह्वीलर्स और 40 हज़ार से ज्यादा पैसेंजर्स कार शामिल हैं। 

स्टॉक क्लियर करने के नाम पर वाहनों को भारी डिस्काउंट पर बेचना कोई अपराध नहीं है लेकिन हमें लगता है कि ये एक तरह का नैतिक भ्रष्टाचार है। इसी तरह भारी डिस्काउंट के लालच में वाहन खरीदने पर किसी को सज़ा नहीं दी जा सकती लेकिन ये एक तरह का लालच ज़रूर है। क्योंकि BS-3 तकनीक पर आधारित जिन वाहनों को खरीदा और बेचा गया है वो जब सड़कों पर चलेंगे तो प्रदूषण फैलाएंगे। प्रदूषण बढ़ेगा तो लोगों की जान जाएगी और प्रदूषण, वाहन खरीदने वालों की जान भी ले सकता है और वाहन बेचने वालों की भी।

ये हाल तब है जब सरकार खुद ये मानती है कि भारत में वायु प्रदूषण के हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। कुछ दिनों पहले सरकार ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि दिल्ली, फरीदाबाद, वाराणसी, लखनऊ और जयपुर देश के सबसे प्रदूषित शहर हैं। एयर क्वालिटी इंडेक्स के मुताबिक 1 मई 2015 से लेकर मार्च 2017 के बीच दिल्ली वालों को एक दिन के लिए भी साफ हवा नसीब नहीं हुई। यानी 2 साल से लगातार दिल्ली वाले उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं जब उन्हें साफ हवा मिल पाएगी। 665 दिनों में से सिर्फ 47 दिन ऐसे थे जब दिल्ली की हवा कुछ बेहतर थी। हालांकि इन 47 दिनों की हवा को भी सुरक्षित नहीं कहा जा सकता।

वाहन कंपनियों को अच्छी तरह पता था, कि उन्हें BS-3 तकनीक पर आधारित वाहन बेचना बंद कर देना चाहिए। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वाहन कंपनियों का इंजन मुनाफे वाले पेट्रोल से चलता है और BS-4 जैसी तकनीक लाने के लिए उन्हें ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसी लालच की वजह से वाहन कंपनियों ने BS-4 तकनीक को एक तरह से वैचारिक हैंड ब्रेक लगाकर रोका हुआ था। ज्यादातर लोगों को शायद BS-3 या BS-4 तकनीक के बारे में नहीं पता होगा। कंपनियां, लोगों को लुभावने विज्ञापनों के ज़रिए लालच देती हैं और लोग ऐसे वाहन खरीद लेते हैं, जो सिर्फ ज़हर उगलते हैं। अखबार में नवरात्रि के शुभ आरंभ के नाम पर डिस्काउंट का ऑफर देना कोई अपराध नहीं है। लेकिन अगर कंपनियां साफ साफ बता देतीं कि वो ये डिस्काउंट इसलिए दे रही हैं क्योंकि 1 अप्रैल से उनके वाहन अवैध हो जाएंगे तो शायद ये एक अच्छी शुरुआत होती लेकिन कंपनियों ने हमेशा की तरह ऐसा नहीं किया। इसी तरह अगर वाहन खरीदने वाले आम लोग थोड़ी सी समझदारी दिखाते और लालच नहीं करते तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती थी। 

उत्सर्जन मानकों को लेकर दुनिया की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी वॉक्सवैगन भी बहुत बदनाम रही है। 

जर्मनी के वॉक्सवैगन ग्रुप ने ये स्वीकार किया था कि उसने वर्ष 2008 से लेकर 2015 तक अमेरिका और यूरोप में 1 करोड़ 10 लाख ऐसी कारें बेची थीं, जिनमें खराबी थी। ये कारें चार गुना ज्यादा नाइट्रिक ऑक्साइड नाम का प्रदूषित धुंआ छोड़ रही थीं और कंपनी ने बड़ी ही चालाकी से इन कारों में एक ऐसा डिवाइस फिट किया हुआ था, जिससे ये कारें तमाम टेस्ट्स में पास हो जाती थीं। हालांकि, बाद में वॉक्सवैगन की इस चालाकी के बारे में दुनिया को पता चल गया। अमेरिका ने इस अपराध के लिए वॉक्सवैगन पर करीब 28 हज़ार करोड़ रुपये का ज़ुर्माना लगाया था। ज़रा सोचिए, क्या ऐसा भारत में हो सकता है। लेकिन इतने वर्षों में इन कारों ने जो प्रदूषण फैलाया, उससे हज़ारों लोगों की मौत होनी तय है। 

अमेरिका के MIT के वैज्ञानिकों ने इस बात पर बाकायदा रिसर्च किया गया कि वॉक्सवैगन कंपनी द्वारा उनके देश में बेची गईं करीब 4 लाख 80 हज़ार कारों से निकले प्रदूषण की वजह से कितने लोगों की मौत होगी? इस रिसर्च में पता चला कि इससे अमेरिका में कम से कम 60 लोगों की प्री-मेच्योर डेथ हो जाएगी यानी 60 लोग वक्त से पहले ही मर जाएंगे। लेकिन ये कारें अमेरिका के अलावा यूरोप में भी बेची गईं थीं। शोधकर्ताओं ने ये पाया कि इन वर्षों के दौरान पूरे यूरोप में वॉक्सवैगन की प्रदूषित कारों की वजह से 1200 लोगों की मौत वक्त से पहले ही हो जाएगी। 

इनमें से 500 लोगों की मौत तो अकेले जर्मनी में होने की आशंका जताई गई है। क्योंकि वॉक्सवैगन कंपनी जर्मनी की ही है और उसने अपने देश में करीब 26 लाख ऐसी कारें बेची थीं जो ज़्यादा प्रदूषण फैलाती थीं। लेकिन अभी भी वॉक्सवैगन ने बड़ी संख्या में कारें वापिस नहीं ली हैं। ऐसे में इस बात पर भी रिसर्च किया गया है कि अगर वॉक्सवैगन इस वर्ष के अंत तक पूरे यूरोप से अपनी कारें वापिस ले लेता है तो 2 हज़ार 600 लोगों को वक्त से पहले मरने से बचाया जा सकता है। 

यानी अमेरिका और यूरोप में कार बनाने वाली एक कंपनी ने गड़बड़ की और वहां के लोगों ने ये भी बता दिया कि इस कंपनी की गड़बड़ से कितने लोगों की मौत होगी। जबकि भारत में इन दो दिनों में लाखों ऐसी गाड़ियां बिक चुकी हैं जो ज़रूरत से ज़्यादा प्रदूषण फैलाएंगी, लेकिन हमारे पास ये जानने का कोई फॉर्मूला नहीं है कि इन प्रदूषित गाड़ियों से भारत में कितने लोगों की ज़िंदगी पर असर पड़ेगा। 

कुल मिलाकर आज जो कुछ भी हुआ वो निराशाजनक था आज भारत के लोगों ने ये बता दिया कि वो पर्यावरण को साफ करने की ज़िम्मेदारी कभी नहीं उठाना चाहते। भारत के लोगों को पर्यावरण से कोई लेना देना नहीं हैं। उनके लिए पांच, दस या बीस हज़ार रुपये बचाना ज़्यादा ज़रूरी है प्रदूषण फैले या ना फैले इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। हंमारे देश के लोगों को लगता है कि पर्यावरण की रक्षा करना सिर्फ सरकार और सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी है.. 

यहां नोट करने वाली बात ये भी है कि जो लोग आज BS-3 वाहन खरीद रहे थे वो अति गरीब नहीं हैं, उन्हें तत्काल इन वाहनों को खरीदने की कोई ज़रूरत नहीं थी। ये वो लोग हैं जिनके पास इतना पैसा था कि वो अचानक डिस्काउंट मिलने पर कोई वाहन खरीद सकें। ये मध्यम वर्ग के लोग थे और इन लोगों ने आज बता दिया कि उनकी सोच कितनी प्रदूषित है ये भारत के लोगों के चरित्र का एक DNA टेस्ट था जिसमें वो फेल हो गये हैं।

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देवबंद में मौलाना मसूद मदनी पर हमला

Hindi News:  जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनी के भाई मौलाना मसूद मदनी के खिलाफ देवबंद में जबरदस्त प्रदर्शन हुआ। इस दौरान उन पर हमले की भी कोशिश की गई।

मसूद मदनी देवबंद में पेशी के लिए आये थे। वहीं कुछ धार्मिक संगठनों के लोगों ने पुलिस की गाड़ी पर भी हमला किया। बड़ी मुश्किल से पुलिस ने मसूद मदनी को बचाया और न्यायालय में किया पेश। मौलाना मसूद मदनी को पिछले दिनों बलात्कार के एक मामले में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। इस हाईप्रोफाइल मामले में पुलिस पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए है।

गौरतलब है कि हरियाणा के जींद जनपद निवासी महिला ने देवबंद के रसूखदार मदनी परिवार के सदस्य मसूद मदनी पर धोखे से कई बार रेप करने का आरोप लगाया था।

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आधार को और सुरक्षित बनाने की तैयार में सरकार

नई दिल्ली : कल्याणकारी योजनाओं और जरूरी सेवाओं में आधार की उपयोगिता को देखते हुए सरकार इसे और सुरक्षित बनाने की तैयारी कर रही है. सरकार आधार को और सुरक्षित करने के लिए तीन स्तरीय सुरक्षा प्रणाली बनाएगी. इसके तहत आधार वैरिफिकेशन करने वाले बॉयोमेट्रिक डिवाइस को पहले से ज्यादा सुरक्षित बनाया जाएगा. अभी बॉयोमेट्रिक डिवाइस में दो स्तर का सुरक्षा प्रणाली काम करती है.  

मनीभास्कर डॉट कॉम अपनी रिपोर्ट में यूआईडीएआई एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से कहा है कि आधार के लिए पहले से ज्यादा सुरक्षित प्रणाली तैयार की जा रही है जिसमें रजिस्टर्ड बायोमेट्रिक डिवाइस का इस्तेमाल किया जाएगा. नए डिवाइस एक जून 2017 से कंपनियों को यूज करना होगा. साथ ही पुराने पब्लिक डिवाइस को नए पैरामीटर के आधार पर सॉफ्टवेयर के जरिए अपडेट भी किया जाएगा. 

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हर लेवल पर होगा डाटा इनक्रिप्टेड 

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अधिकारी के अनुसार तीन स्तरीय सुरक्षा प्रणाली का सबसे बड़ा फायदा यह है कि हर लेवल पर डाटा इनक्रिप्टेड होगा. साथ ही वह किसी से लिंक नहीं होगा. ऐसे में डाटा लीक होने के आशंका कम हो जाएगी. अधिकारी के अनुसार इसके लिए मौजूदा डिवाइस से लेकर नए डिवाइस सब अपडेट हो जाएंगे. अभी तक आधार अथंटिकेशन में जिस पब्लिक डिवाइस का इस्तेमाल होता है वह आधार सिस्टम के साथ रजिस्टर्ड नहीं होता है जबकि नया रजिस्टर्ड डिवाइस आधार सिस्टम से रजिस्टर्ड होगा जो कि इनक्रिप्शन की की मैनेजमेंट के लिए होगा.

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कश्मीर में पत्थरबाजों से निपटने के लिए नया हथियार

Hindi News: कश्मीर घाटी में हिंसक प्रदर्शनों को रोकने के लिए तीखी जेली से भरे हुए ग्रेनेड सुरक्षा बलों के हथियारों के जखीरे में शामिल किए जा सकते हैं। इस ग्रेनेड के फटने पर आंखों में जलन होती है । साथ ही पेलेट गन का इस्तेमाल जारी रहेगा। पेलेट गनों का इस्तेमाल तभी किया जाएगा जब कम जानलेवा हथियार पत्थरबाजों पर काबू पाने में नाकाम रहेंगे और बिल्कुल अंतिम तरीके के तौर पर फायरिंग का आदेश दिए जाने से पहले तक इसे इस्तेमाल किया जाएगा।

ऐसे ग्रेनेड इस्तेमाल करने का सुझाव केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में आया। यह बैठक उस वक्त बुलाई गई जब एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने पेलेट गन से नाबालिगों को हुए शारीरिक नुकसान पर चिंता जताई थी और केंद्र और राज्य सरकारों से कहा कि वे प्रदर्शनों से निपटने के लिए अन्य प्रभावी तरीकों पर विचार करें, क्योंकि यह ‘जिंदगी और मौत’ से जुड़ा मामला है।

सूत्रों ने बताया कि ओलोइयोरेसिन आधारित गोले तत्काल समाधान के तौर पर उभरकर आए और जरूरी परीक्षणों के बाद सुरक्षा बल इसका इस्तेमाल कर सकेंगे। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन की रक्षा प्रयोगशाला रक्षा अनुसंधान और विकास प्रतिष्ठान की ओर से इसका निर्माण किया जा रहा है।

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दिल्ली के सीएम केजरीवाल द्वारा चलाए जा रही ‘स्पाई यूनिट’ सीबीआई के रडार पर !

नई दिल्ली: दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के तहत एक सीक्रेट ग्रुप जो काम कर रहा है वह संदिग्ध वित्तीय लेनदेन के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के रडार के नीचे आ गया है. मीडिया सूत्रों के हवाले से यह खबर सामने आ रही है.

दिल्ली सरकार के विजिलेंस विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार ने स्कूलों में जारी भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए एक खूफिया यूनिट का निर्माण किया था. फीडबैक यूनिट नाम का ये ग्रुप सीधे मुख्ममंत्री अरविंद केजरीवाल के नीचे काम करता था.

मीडिया सूत्रों के मुताबिक फीडबैक यूनिट को 1 करोड़ रुपये का गुप्त सेवा निधि आवंटित किया गया था, लेकिन स्टिंग ऑपरेशन पर केवल 50,000 रुपये खर्च किए.

ये पैसा एसीबी के क्लर्क कैलाश चंद के नाम पर जारी किया गया

कालका पब्लिक स्कूल में दाखिले को लेकर मांगे जाने वाली रिश्वत की शिकायत के आधार पर जांच के लिए करीब 50 हजार रुपए खर्च किए गए. ये पैसा एसीबी के क्लर्क कैलाश चंद के नाम पर जारी किया गया था.

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लेकिन जब रिकॉर्ड की जांच की गई तो पाया गया कि इस नाम को कोई कर्मचारी एसीबी में काम ही नही करता. ‘डीएनए’ को मिले दस्तावेजों से ये खुलासा हुआ है.सूत्रों के मुताबिक पिछले महीने सीबीआई ने इस मामले में एक केस भी दर्ज किया है.

वहीं सूत्रों के मुताबिक इस खुफिया विभाग में इंटेलिजेंस ब्यूरों के कुछ रिटायर्ड अधिकारी, इन्कम टैक्स और दूसरी जांच एंजेन्सियों के अधिकारी इस खुफिया यूनिट का हिस्सा थे, जिन्हें पैसे और व्हीकल की सहायता की गई थी.

खुफिया विभाग को एक कार, दो एसयूवी और तीन मोटरसाइकिल दी गई 

विजिलेंस विभाग की एक लेटर के अनुसार इस खुफिया विभाग को एक कार, दो एसयूवी और तीन मोटरसाइकिल दी गई थी. इसके अलावा चारा डाटा ऑपरेटर भी स्पोर्टिंग स्टाफ के तौर पर लगाए गए थे. सीबीआई अब इस केस की छानबीन कर रही है.

इस फीडबैक यूनिट में शामिल कर्मचारियों को मेहनताना उपस्थिति के आधार पर दिया जाता था. लेकिन जिस विजिलेंस विभाग के अधीन इस यूनिट को बनाया गया था उसे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि इस यूनिट के कर्मचारी कहां बैठते थे और इन्होंने क्या काम किया. इस सारे मामले की गंभीरता से जांच हो रही है.

 

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एयरपोर्ट पर हैंड बैगेज पर नहीं लगेगी सुरक्षा मुहर

Hindi News: 1 अप्रैल से देश के 7 हवाई अड्डों पर यात्रियों के सुरक्षा जांच में थोड़ी राहत मिलेगी। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद और कोच्चि के हवाई अड्डों पर यात्रियों को अपने केबिन बैग के टैग पर सुरक्षा मुहर नहीं लगवानी पड़ेगी।

सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्यॉरिटी फोर्स ने इन एयरपोर्ट्स पर कुछ जरूरी बदलाव करके यह फैसला घरेलू और इंटरनैशनल, दोनों यात्रियों के लिए लिया है। नागरिक उड्डयन सुरक्षा विनियामक ने बीती 23 फरवरी को इन 7 एयरपोर्ट्स पर यह व्यवस्था खत्म करने की मांग की थी।

CISF के चीफ ओ. पी. सिंह ने बताया कि दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल 1 और 3 पर हाई डेफिनिशन कैमरे इंस्टॉल किए गए हैं। प्री-एंबार्केशन सिक्यॉरिटी चेक एरिया (जहां यात्री सिक्यॉरिटी चेक के लिए लाइन लगाते हैं) में 36 और सिक्यॉरिटी होल्ड एरिया में 44 कैमरे लगे हैं। इन बदलावों के बाद ही इस व्यवस्था को CISF ने हरी झंडी दी है। अब बचे हुए 52 एयरपोर्ट्स के लिए भी CISF की यही योजना है कि कैसे इन हवाई अड्डों पर भी यह व्यवस्था लागू की जा सकती है। इसके लिए इनमें से कुछ एयरपोर्ट्स पर नई व्यवस्था का ट्रायल रन किया जा सकता है।

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Zee जानकारी: सचिन और रेखा को…किसी ने संसद में क्यों नहीं देखा?

सम्मान पाया नहीं जाता, कमाया जाता है. फिर वो चाहे किसी भी क्षेत्र में क्यों ना हो. जैसे सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट की दुनिया में सम्मान कमाया और रेखा ने फिल्मों की दुनिया में. लेकिन सम्मान कमाने में जितना लंबा वक्त लगता है. उसे ठेस पहुंचाने में उतना ही कम समय लगता है. ये बात आज सचिन तेंदुलकर और रेखा को समझ में आ रही होगी. आज राज्यसभा में सचिन तेंदुलकर और रेखा पर सवाल उठाए गये हैं और इसकी वजह है इन दोनों की Attendence.राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने सांसद सचिन तेंदुलकर और रेखा की संसद से Bunk मारने वाली आदत पर ऐतराज़ जताया और कहा कि अगर इन दोनों सांसदों की संसद में दिलचस्पी नहीं है, तो ये दोनों इस्तीफा क्यों नहीं दे देते.

5 साल पहले जब सचिन तेंदुलकर और रेखा को राज्यसभा के लिए Nominate किया गया था तो पूरे देश ने इस फैसले का स्वागत किया था. खासतौर पर सचिन तेंदुलकर से पूरे देश को उम्मीद थी कि वो देश में खेलों के हालात सुधारने के लिए बहुत कुछ करेंगे. लेकिन सचिन तेंदुलकर ने ये उम्मीदें तोड़ दीं. राज्यसभा की Website के मुताबिक इस साल संसद के बजट सत्र में सचिन तेंदुलकर ने एक दिन हिस्सा लिया है. यही हाल रेखा का भी है. वो भी बजट सत्र में सिर्फ एक दिन संसद में पहुंची हैं.

आपको बता दें कि बजट सत्र 31 जनवरी 2017 से शुरू हुआ था. पिछले साल यानी वर्ष 2016 में भी सचिन सिर्फ 9 बार राज्यसभा में हाज़िर रहे थे. सचिन तेंदुलकर ने सांसद के तौर पर पिछले 5 वर्षों में सिर्फ 22 सवाल पूछे हैं. सचिन तेंदुलकर नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद सिर्फ 20 दिन संसद में दिखाई दिए हैं. सचिन तेंदुलकर के करीब 60 महीने पुराने संसदीय जीवन में. राज्यसभा में उनकी उपस्थिति सिर्फ 8 प्रतिशत दर्ज की गई है. यानी वो सिर्फ 23 दिन राज्यसभा में आए हैं. कुल मिलाकर क्रिकेट की दुनिया का भगवान. संसद में ज्यादातर अदृश्य ही रहा है. जाहिर है राजनीति के जरिये देशसेवा की पिच पर सचिन तेंदुलकर क्लीन बोल्ड हो गये हैं.
 
वैसे अपने जमाने की मशहूर Actress रेखा भी इस मामले में सचिन का साथ पूरी शिद्दत से निभा रही हैं. सचिन तेंदुलकर के साथ ही रेखा को भी अप्रैल 2012 में राज्यसभा सदस्य के तौर पर नामांकित किया गया था. पिछले वर्ष रेखा सिर्फ तीन बार संसद की कार्यवाही में शामिल हुई थीं. रेखा नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद सिर्फ 10 बार राज्यसभा में आई हैं. और कुल मिलाकर रेखा अपने संसदीय करियर में अब तक सिर्फ 16 बार राज्यसभा में दिखाई दी हैं. यानी राज्यसभा में उनकी Attendance सचिन तेंदुलकर से भी कम है. 

आपको बता दें कि इस वक्त राज्यसभा में नामांकित सांसदों की संख्या 12 हैं. अगर इनमें से सचिन और रेखा को हटा दिया जाए. तो बाकी के सांसदों की राज्यसभा में उपस्थिति कम से कम 61 प्रतिशत है. सचिन की तरह खेलों की दुनिया से आने वाली Boxer मैरी कॉम ने राज्यसभा की 61 प्रतिशत कार्यवाहियों में हिस्सा लिया है. जबकि संभा जी छत्रपति नामक राज्यसभा सांसद की उपस्थिति 100 प्रतिशत है. संभा जी छत्रपति कोल्हापुर के शाही खानदान के वारिस हैं.

सचिन तेंदुलकर, क्रिकेट से रिटायर हो चुके हैं. रेखा भी अब फिल्मी दुनिया में ज्यादा Active नहीं है. ऐसे में ये दोनों राज्यसभा में उपस्थित क्यों नहीं होते. ये सवाल अब ज़ोर शोर से उठ रहे हैं. राजनीति की दुनिया में अब इन दोनों पर तीखे सवालों के बाउंसर फेंके जा रहे हैं. सचिन तेंदुलकर और रेखा अपने अपने क्षेत्रों के दिग्गज हैं. हम इन दोनों का पूरा सम्मान करते हैं. लेकिन सम्मान के साथ साथ जिम्मेदारियां भी आती हैं. और हमें लगता है कि सांसद के तौर पर इन दोनों ने अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभाया है. 

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वैसे आपको बता दें कि संविधान की धारा 80 के तहत राष्ट्रपति को राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार होता है. ये सदस्य विज्ञान. कला, खेल और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों के बड़े नाम होते हैं. इन सदस्यों का कार्यकाल भी 6 साल का होता है. राज्यसभा में सांसदों की कुल संख्या 243 है। वर्ष 1952 से अबतक करीब 133 लोगों को राज्यसभा में मनोनीत किया जा चुका है. इनमें से कुछ नाम ऐसे हैं जिनसे सचिन तेंदुलकर और रेखा, राज्यसभा में Active रहने की सीख ले सकते हैं. 

वर्ष 1952 में अपने भाषण में मशहूर कलाकार पृथ्वीराज कपूर ने ‘राष्ट्रीय थियेटर’ शुरू करने की बात कही थी. वर्ष 1953 में मशहूर नर्तकी रुक्मिणी देवी की पहल पर जानवरों पर अत्याचार रोकने के लिए एक विधेयक पेश किया गया था. 1973 में कार्टूनिस्ट अबू अब्राहम ने सूखा पीड़ित इलाक़ों की समस्याओं को संसद में ज़ोर-शोर से उठाया था. 1980 में भारत के जाने माने लेखकों में से एक आर.के नारायण ने संसद में अपने पहले भाषण में भारी-भरकम स्कूल बैग को हटाने की मांग की थी. ताकि बच्चों के कंधों से बोझ कुछ कम हो सके.

जबकि सांसद के तौर पर रेखा और सचिन ने कभी किसी बहस में हिस्सा नहीं लिया और ना ही कभी कोई Private Member Bill पेश किया. प्राइवेट मेंबर बिल उन सांसदों द्वारा लाया जाता है,जो मंत्री नहीं होते हैं. इसलिए इसे प्राइवेट मेंबर बिल कहा जाता है. इन उदाहरणों के आईने में सचिन तेंदुलकर और रेखा की Attendance देखकर लगता है कि उनको राज्यसभा के लिए मनोनीत करना सही फैसला नहीं था.

राज्यसभा में सांसदों की उपस्थिति का राष्ट्रीय औसत 78 प्रतिशत है। जबकि सचिन और रेखा के मामले में ये औसत सिर्फ 8 प्रतिशत और 5 प्रतिशत है. अगर सचिन तेंदुलकर और रेखा चाहें तो वो जावेद अख्तर से भी प्रेरणा ले सकते हैं. राज्यसभा में जावेद अख्तर की Attendance 53 प्रतिशत रही है. वर्ष 1997 से 2003 के दौरान राज्यसभा सांसद रह चुकीं शबाना आज़मी ने संसद की 170 बैठकों में से 113 में हिस्सा लिया था. यानी उनकी हाज़िरी 66 फीसदी से ज़्यादा थी. राज्यसभा के मनोनीत सांसद रहते हुए दारा सिंह की Attendance 57 फीसदी थी. राज्यसभा सांसद रहते हुए फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल की Attendance 74 प्रतिशत थी. इस मामले में लता मंगेशकर का रिकॉर्ड बहुत खराब था. वर्ष 1999 से 2005 तक राज्यसभा सांसद रहीं लता मंगेशकर ने सिर्फ 6 बैठकों में हिस्सा लिया था. फिल्म निर्देशक मृणाल सेन भी 170 में से सिर्फ 30 बैठकों में ही शामिल हुए थे.

आज राज्यसभा में भी जब सचिन और रेखा की Attendance शॉर्ट होने का सवाल उठा तो उपसभापति पी.जे कुरियन ने सार्वजनिक तौर पर जानकारी दी कि सचिन तेंदुलकर 9 मार्च से शुरू हुए बजट सत्र के दूसरे हिस्से से लेकर अब तक संसद में दिखाई नहीं दिए हैं और यही हाल रेखा का भी है. वैसे जब सांसद नरेश अग्रवाल ने रेखा और सचिन तेंदुलकर की शिकायत की तो उप सभापति ने उन्हें एक सुझाव दिया. पीजे कुरियन ने कहा कि वो चाहें तो इन दोनों सांसदों को चिट्ठी लिखकर राज्यसभा में आने का आग्रह कर सकते हैं. वैसे आपको जानकारी दे दें कि सदन में अनुपस्थित रहने वाले सांसदों के खिलाफ संविधान के Article 104 के मुताबिक कार्रवाई होती है. Article 104 में कहा गया है कि अगर कोई सांसद बिना बताए लगातार 60 बैठकों तक सदन में नहीं आता तो उसकी सीट को खाली मान लिया जाता है.

जिसके बाद उस सीट पर दूसरे सदस्य को मनोनीत किया जा सकता है. जब से सचिन तेंदुलकर और रेखा सांसद बने हैं. तब से अब तक राज्यसभा की 350 बैठकें हो चुकी हैं. और इस दौरान कुछ दुर्लभ मौकों पर ही सचिन तेंदुलकर और रेखा राज्यसभा में दिखाई दिए हैं. यहां हम ये साफ करना चाहते हैं कि हम भी सचिन तेंदुलकर के खेल और रेखा की अदाकारी के प्रशंसक हैं. ये दोनों ही लोग अपने अपने क्षेत्र के दिग्गज हैं. लेकिन हर कोई हर भूमिका को ठीक से नहीं निभा सकता. सचिन तेंदुलकर बहुत अच्छे और महान क्रिकेटर हैं. लेकिन एक सांसद के तौर पर उन्हें अच्छा नहीं कहा जा सकता. इसी तरह रेखा बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं. लेकिन उन्हें बहुत अच्छा सांसद नहीं कहा जा सकता.

आपको याद होगा कि सचिन तेंदुलकर एक ज़माने में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान थे. लेकिन उन्होंने अपने खेल पर फोकस करने के लिए कप्तान का पद छोड़ दिया था. वो चाहते तो एक सांसद होने की ज़िम्मेदारी से भी आज़ाद हो सकते थे. क्योंकि किसी ज़िम्मेदारी को ठीक से ना निभा पाने से तो अच्छा है कि उसे छोड़ दिया जाए और अपनी प्रतिभा के मुताबिक काम किया जाए. रेखा ने भी अपने करियर में कई फिल्मों के ऑफर को ठुकराया होगा. क्योंकि उन्हें लगा होगा कि फिल्म में उनकी भूमिका ठीक नहीं है. लेकिन सवाल ये है कि क्या उन्हें कभी ये लगा कि संसद में उनकी भूमिका ठीक नहीं है?

हमें उम्मीद है कि सचिन और रेखा इन बातों पर विचार करेंगे. हमें उनकी काबिलियत पर कोई शक नहीं हैं. और हम उनके प्रशंसक हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम जायज़ सवालों को नहीं उठाएंगे. हमें लगता है कि सचिन तेंदुलकर और रेखा को इस बात पर विचार करना चाहिए कि अगर उनकी जगह कोई और योग्य व्यक्ति राज्यसभा में आए. तो देश का कितना फायदा हो सकता है?

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केजरीवाल के एक और विधायक ने दिखाए बागी तेवर

Delhi Hindi News: आम आदमी पार्टी के एक अन्य विधायक जनकपुरी से राजेश ऋषि ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को नसीहत देने वाला एक ट्वीट कर सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी। ऋषि ने केजरीवाल का नाम लिए बिना अपने एक ट्वीट में लिखा ‘जिस राजा में घमंड होता है वह राजा अपने राज्य को खुद ही डुबो देता है।’ यह ट्वीट उन्होंने आप नेता कुमार विश्वास को भी टैग किया था। नेता प्रतिपक्ष विंजेंद्र गुप्ता ने इस ट्वीट के जरिए “आप” में बगावत तेज होने की बहस को हवा दे दी।

ज्ञात हो कि 29 अप्रैल को भी आप नेतृत्व पर परोक्ष तौर से तंज कसते हुए एक अन्य ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने लिखा कि ‘आज जिन पार्टी नेताओं को चाटुकार पसंद हैं वे सावधान, इन्हीं चाटुकारों ने कांग्रेस को डुबोया अब और पार्टियों की बारी है।’

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कोहली, मुरली मनोहर जोशी, शरद पवार सहित 39 हस्तियों को पद्म अवॉर्ड

नयी दिल्ली: दिग्गज नेताओं शरद पवार, मुरली मनोहर जोशी और लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष दिवंगत पीए संगमा, क्रिकेटर विराट कोहली और गायिका अनुराधा पौडवाल सहित 39 लोगों को गुरुवार को पद्म पुरस्कार प्रदान किये गए. राष्ट्रपति भवन में गुरुवार शाम आयोजित विशेष कार्यक्रम में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जोशी, पवार, संगमा (मरणोपरांत) और ईसरो के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर उडिपी रामचन्द्र राव को देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा.

योग गुरु स्वामी निरंजनानंद सरस्वती, थाईलैंड की राजकुमारी महा चक्री सिरिनधोरन और भारत में लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के जनक तेथेमटोन एराच उदवाडिया को पद्म भूषण सम्मान दिया गया. उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, विभिन्न केन्द्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ नौकरशाहों ने समारोह में भाग लिया.

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली, लोकसभा के पूर्व महासचिव टी. के. विश्वनाथन, जानेमाने एंडोक्रायनोलॉजिस्ट एमएम गोदबोले, फ्रांसीसी इतिहासकार मिशेल दानिनो, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के पूर्व प्रोफेसर अनंत अग्रवाल, कन्याकुमार विवेकानंद रॉक मेमोरियल की उपाध्यक्ष निवेदिता रघुनाथ भिड़े को पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया.

लोक गायिका बसंती बिष्ट, उद्योगपति मोहन रेड्डी वेंकटराम बोडानापु, मधुबनी चित्रकार बउआ देवी, कर्नाटक में हलाक्की आदिवासी की लोक कलाकार सुकरी बोम्मु गौड़ा, पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के ‘बाईक एम्बुलेंस दादा’ करीमुल हक को भी पद्मश्री से सम्मानित किया गया.

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जिन अन्य लोगों को पद्मश्री दिया गया वे हैं.. लेखक नरेन्द्र कोहली, पारा-एथलीट दीपा मलिक, रंगकर्मी वरेप्पा नाबा, कथकली कलाकार चेमनचेरी कुन्हैरामन नैयर, मलयाली कवि अक्किथम अच्युतन नम्बुदरी,खारखान से आदिवासी कलाकार मुकुंद नायक, पर्यावरणविद बलबीर सिंह सीचेवाल और जानीमानी स्त्रीरोग विशेषज्ञ भक्ती यादव. इस वर्ष कुल 89 लोगों के लिए पद्म पुरस्कारों की घोषणा की गयी, जिनमें से 39 को आज (गुरुवार, 30 मार्च) पुरस्कृत किया गया. अन्य लोगों को 13 अप्रैल को सम्मानित किया जाएगा.

कुल 89 लोगों में से 19 महिलाएं हैं. सूची में विदेशी नागरिकों, प्रवासी भारतीयों, पीआईओ श्रेणी के पांच लोग हैं जबकि छह लोगों को सम्मान मरणोपरांत दिया जा रहा है.

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मोदी का नया अवतार, मूंछों पर दिया ताव

National Hindi News: लोकसभा में आज गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स से जुड़े चार बिलों पर ऐतिहासिक चर्चा शुरू हुई. इस दौरान जब कैमरा प्रधानमंत्री मोदी की ओर घूमा तो उनका नया लुक नज़र आया.

प्रधानमंत्री मोदी गहन चिंतन की मुद्रा में बैठे थे. उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई नज़र आ रही थी. उन्होंने बैठे हुए ही एक बार अपनी मूंछों पर ताव दिया. प्रधानमंत्री मोदी अपने नए-नए लुक्स के लिए जाने जाते हैं. प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही उनकी दाढ़ी हमेशा ट्रिम्ड नज़र आती रही है. यह पहली बार है जब वह अपनी बढ़ी दाढ़ी के साथ नज़र आए.

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