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बीजेपी ने रेप पर अध्यादेश को बताया ‘ऐतिहासिक’, विपक्ष ने पूछा क्यों लगा इतना वक्त

नई दिल्ली: बीजेपी ने 12 वर्ष से कम आयु की बच्ची से बलात्कार के मामले में दोषी पाए जाने पर मृत्युदंड सहित कठोर दंड वाले प्रावधान संबंधी अध्यादेश को ‘ऐतिहासिक’ करार दिया. वहीं विपक्षी दलों ने सवाल किया कि सरकार को यह कदम उठाने में इतना वक्त क्यों लग गया. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि यह कदम महिला सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में नरेंद्र मोदी सरकार की प्रतिबद्धता को दिखाता है.

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट किया, “मैं महिलाओं की सुरक्षा पर ऐतिहासिक अध्यादेश के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कैबिनेट का शुक्रिया अदा करता हूं और बधाई देता हूं. मैं 12 साल से कम उम्र की किसी बच्ची के साथ बलात्कार के लिए फांसी की सजा के प्रावधान का और 16 साल से कम उम्र की किशोरी के साथ इस अपराध को अंजाम देने वाले के लिए सजा बढ़ाकर 10 साल से 20 साल करने के प्रावधान का स्वागत करता हूं.” 

कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि यह संवेदनशील मुद्दा है और ये घटनाएं शर्मनाक हैं. उन्होंने कहा, “हमें ऐसी घटनाओं की जड़ तक पहुंचना चाहिए क्योंकि न्यायपालिका हमें एक हद तक ही मदद कर सकती है.” 

माकपा नेता वृंदा करात ने कहा कि दुर्लभतम मामलों में मृत्युदंड दिया जाता है लेकिन उनकी पार्टी सैद्धांतिक रूप से फांसी की सजा के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि असली समस्या यह नहीं है कि बच्ची से बलात्कार करने वालों को मृत्युदंड नहीं दिया जा रहा है बल्कि मुद्दा यह है कि सत्तासीन लोग बलात्कारियों को ‘बचा’ रहे हैं. 

कठुआ बलात्कार और हत्या मामले में वकीलों के प्रदर्शन के बारे में परोक्ष रूप से करात ने कहा, ‘‘हमने बीजेपी के गोरक्षक होने के बारे में सुना था लेकिन अब वे बलात्कारियों के रक्षक हो गए हैं. बलात्कारियों की रक्षा करने वालों को दंडित किया जाना चाहिए.’’ 

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इस तरह का कदम वक्त की नजाकत है. अमरिंदर ने कहा कि ऐसे अपराधी मानवता के चेहरे पर एक धब्बा हैं और वह किसी दया के लायक नहीं है. उन्होंने कहा कि वह नाबालिगों से बलात्कार के मामलों में ऐसे दंड के पक्ष में है जो नजीर बन सके. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने ट्वीट कर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का यह फैसला स्वागतयोग्य है. 

कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि पार्टी ऐसे मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में किसी भी गंभीर कदम का स्वागत करती है. उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार की मंशा को लेकर जो सवाल मेरे मन में आता है, वह यह है कि उन्हें इस नतीजे पर पहुंचने में इतना वक्त क्यों लगा कि कड़े कानून और कठोर दंड से जरूरी परिवर्तन आएगा.’’ 

बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कहा कि आज का दिन ‘बहुत ऐतिहासिक’ है क्योंकि सरकार ने लंबे समय से की जा रही मांग को पूरा किया है. केंद्र के इस फैसले का स्वागत करते हुए जम्मू – कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि उनकी सरकार राज्य में इसी तरह का कानून लाएगी. 

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Now Math’s mahant files nomination । BJP से नहीं मिला टिकट, तो मठ के महंत निर्दलीय प्रत्याशी बनकर उतरे मैदान में

बेंगलुरु : कर्नाटक के चुनावों में सबसे अहम भूमिका यहां के मठ निभा रहे हैं. हर राजनीतिक दल मठों का आशीर्वाद पाने के लिए मंदिर-मठों की तरफ दौड़ लगा रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी हों या बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कर्नाटक दौरे की शुरूआत मठों में मत्था टेककर ही शुरू करते हैं. कर्नाटक की राजनीति में मठों के बढ़ते महत्व को देखते हुए अब मठ के महंत खुद ही राजनीति में ताल ठोकने के लिए उतर रहे हैं. मठों के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब कोई महंत चुनाव में उतर रहा है. 

सदियों पुराने उडुपी के अष्ठ मठों के एक महंत ने चुनाव मैदान में उतरते हुए 12 मई को होने जा रहे कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन भरा. इन मठों के इतिहास में यह पहली बार हुआ है. शीरूर मठ के महंत श्री लक्ष्मीवर तीर्थ स्वामी ने भाजपा का टिकट पाने में नाकाम रहने पर बतौर निर्दलीय उम्मीदवार नामांकन भरा. 

अष्ठ मठों के इतिहास में स्वामी ऐसे पहले महंत हैं जो चुनाव लड़ रहे हैं. उन्होंने उडुपी में संवाददाताओं से कहा कि वह भाजपा से टिकट चाहते थे लेकिन उन्हें नहीं दिया गया. उन्होंने कहा, ‘बतौर निर्दलीय उम्मीदवार मेरी उम्मीदवारी से भाजपा और प्रधानमंत्री को फायदा होगा.’ 

‘मठ’ की शरण में बीजेपी-कांग्रेस
कर्नाटक के 30 जिलों में 600 से अधिक मठ हैं. इन ‘मठों’ ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, भाजपा के प्रमुखों को अपनी शरण में आने पर मजबूर कर दिया है. कर्नाटक में हमेशा से ही मठों की राजनीति हावी रही और लोगों पर मठों का खासा प्रभाव रहा है. लिहाजा राजनीतिक पार्टियां चुनावी समय में मठों के दर्शन कर वहां के मठाधीशों को अपनी ओर लुभाने की कोशिश करती रही हैं. ऐसे में मतदाताओं पर मठों के प्रभाव को देखते हुए बीजेपी और कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं.

Karnataka

लिंगायत समुदाय के 400 मठ
संत समागम से जुड़े स्वामी आनंद स्वरूप ने कि बताया कि कर्नाटक में लिंगायत समुदाय से जुड़े करीब 400 छोटे-बड़े मठ हैं, जबकि वोकालिगा समुदाय से जुड़े करीब 150 मठ हैं. कुरबा समुदाय से 80 से अधिक मठ जुड़े हैं. इन समुदायों का कर्नाटक की राजनीति में खासा प्रभाव है, ऐसे में राजनीतिक दलों में इन मठों का आर्शीवाद प्राप्त करने की होड़ लगी रहती है.

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लिंगायत बने अल्पसंख्यक
बता दें कि राज्य में चुनावों की घोषणा से ठीक पहले कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय को अल्‍पसंख्‍यक दर्जा देने की घोषणा की थी. लिंगायत समुदाय राज्‍य की 17 फीसद आबादी का प्रतिनिधित्‍व करता है और 224 सदस्‍यीय विधानसभा की 100 सीटों पर अपना प्रभाव रखता है. इस समुदाय को परंपरागत रूप से बीजेपी का वोटर माना जाता है और इस पार्टी के सीएम चेहरे बीएस येदियुरप्पा इसी समुदाय से ताल्‍लुक रखते हैं. 

1144 नामांकन पत्र दाखिल
कर्नाटक में 12 मई को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए शनिवार को 368 नामांकन दाखिल किए गए. इस तरह अब तक 1144 नामांकन पत्र दाखिल हो चुके हैं. शनिवार को नामांकन दाखिल करने वालों में पूर्व मंत्री बी श्रीरामुलू भी हैं. श्रीरामुलू खनन कारोबारी जी जर्नादन रेड्डी के करीबी सहयोगी हैं. 

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पंजाब कांग्रेस में फूट, मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज दो विधायकों ने दिया इस्तीफा

चंडीगढ़ : पंजाब मंत्रिमंडल विस्तार में मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज कांग्रेस नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है और इसी क्रम में उसके दो अन्य विधायकों ने पार्टी के पदों से इस्तीफा दे दिया. संगरूर जिले के अमरगढ़ से विधायक सुरजीत सिंह धीमान और फजिल्का के बलुआना से विधायक नत्थू राम ने पंजाब प्रदेश कांग्रेस समिति (पीपीसीसी) के प्रमुख सुनील जाखड़ को पार्टी के पदों से अपना इस्तीफा सौंप दिया.

पंजाब के मंत्रिमंडल में शनिवार को 9 नए मंत्रियों को शामिल किया गया था. उनके शपथ ग्रहण से कुछ देर पहले ही इन विधायकों ने अपना इस्तीफा दे दिया. इससे पहले कांग्रेस विधायक संगत सिंह गिलजियां ने इस मुद्दे पर अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) और पंजाब प्रदेश कांग्रेस समिति के उपाध्यक्ष पद से शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया था. नत्थू राम ने पीपीसीसी महासचिव पद से इस्तीफे की घोषणा करते हुए कहा कि पार्टी द्वारा दलित समुदाय की उपेक्षा के कारण उन्होंने यह कदम उठाया है. वहीं, सुरजीत सिंह धीमान के पीपीसीसी के उपाध्यक्ष पद से त्यागपत्र की घोषणा उनके बेटे जसविंदर धीमान ने की.

राम दलित समाज से आते हैं जबकि सुरजीत पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं. दो बार के विधायक राम ने कहा कि मंत्रिमंडल विस्तार में मंत्री पद नहीं दिये जाने से दलित अपमानित महसूस कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि पंजाब में दलितों की आबादी 34 फीसदी है और अगर हम इस आंकड़े पर गौर करें तो मंत्रिमंडल में कम-से-कम पांच दलित मंत्री होने चाहिएं. 

मुख्यमंत्री अमरिदंर सिंह ने हालांकि नए मंत्रियों के चयन में किसी तरह के अन्याय से इनकार किया है. सिंह ने कहा कि सभी धड़े और क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया है और मुख्य रूप से वरिष्ठता का ख्याल रखा गया है. 

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते एवं खन्ना से विधायक गुरकीरत सिंह कोटली ने कहा कि पार्टी के लिए चुनाव जीत चुके पुराने और पारंपरिक परिवारों का मंत्रिमंडल में पद के लिए विचार करना चाहिए. कपूरथला जिले के सुल्तानपुर लोधी से विधायक नवतेज सिंह चीमा ने कहा, ‘मैं मंत्री बनने के सभी मानदंडों पर खरा उतरता हूं लेकिन एक कनिष्ठ व्यक्ति को शामिल किया गया. मैंने तीन चुनाव लड़े और तीनों जीते.’ कपूरथला जिले के सुल्तानपुर लोधी से विधायक चीमा ने कहा कि वह इस बात से निराश हैं कि दोआबा क्षेत्र को नजरअंदाज किया गया है.

डेरा बाबा नानक से विधायक सुखजिंदर सिहं रंधावा को मंत्रिमंडल में शामिल करने के साथ ही गुरदासपुर जिले से अब तीन मंत्री हो गए हैं. जिले के तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा (फतेहगढ़ चूड़ियां) और अरुणा चौधरी (दीनानगर) पहले से ही मंत्रिमंडल में हैं. ओपी सोनी (अमृतसर मध्य) और सुखबिंदर सरकारिया (राजा सांसी) को शामिल करने के साथ ही अमृतसर से अब तीन मंत्री हो गए हैं. अमृतसर पूर्व से नवजोत सिंह सिद्धू पहले ही मंत्री हैं. चीमा ने कहा कि वह यह समझ नहीं पाए कि क्यों आखिरी क्षण में उनका नाम हटा दिया गया और वह इस मामले को मुख्यमंत्री के समक्ष उठाएंगे. इस बीच, कोटली ने पंजाब के पारंपरिक परिवारों के पक्ष में दलीलें दीं.

बता दें कि कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिदंर सिंह के बीच नई दिल्ली में दो दिन लगातार बैठक के बाद नौ नए मंत्रियों के नामों पर मुहर लगाई थी. 

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Truth always prevails: Kodnani on Naroda Patiya case acquittal | नरोदा पाटिया मामले में बरी होने पर बोलीं माया कोडनानी

अहमदाबाद: वर्ष 2002 के नरोदा पाटिया नरसंहार मामले में बरी होने वाली गुजरात की पूर्व मंत्री माया कोडनानी ने शनिवार को कहा कि उन्होंने सक्रिय राजनीति में शामिल होने के बारे में अभी विचार नहीं किया है, लेकिन वह बीजेपी की कार्यकर्ता बनी रहेंगी. उन्होंने शुक्रवार को अपने बरी होने पर कहा, ‘सत्य की हमेशा जीत होती है’. यह फैसला करीब एक दशक बाद आया. उन्हें भीड़ द्वारा 97 लोगों की हत्या किए जाने के मामले में आरोपी बनाया गया था. 

‘मैं एक पार्टी कार्यकर्ता हूं और आगे भी बनी रहूंगी’
कोडनानी ने एक स्थानीय टीवी चैनल से कहा, ‘मैं एक बीजेपी कार्यकर्ता हूं , मैं एक बीजेपी कार्यकर्ता थी और बीजेपी की कार्यकर्ता रहूंगी. मैंने इसके बारे में ( सक्रिय राजनीति में लौटने ) अभी सोचा नहीं है , क्योंकि अदालत का फैसला अभी कल ही आया है. मैं एक पार्टी कार्यकर्ता हूं और आगे भी बनी रहूंगी.’ तीन बार विधायक रहीं पूर्व मंत्री ने कहा कि उन्हें पूरे परिवार ने समर्थन दिया, जिससे इस मुश्किल वक्त से बाहर आने की उन्हें ‘‘ शक्ति ’’ मिली. 

बीजेपी नेताओं द्वारा उनकी रिहाई का स्वागत किए जाने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा , ‘मैं एक बीजेपी कार्यकर्ता हूं और इसलिए , पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और शुभचिंतकों द्वारा ऐसा किया जाना स्वाभाविक है.’ 

गुजरात सरकार में रह चुकी हैं मंत्री
पेशे से स्त्री रोग विशेषज्ञ कोडनानी अहमदाबाद की नरोदा सीट से 1998, 2002 और 2007 में विधायक चुनी गईं. गुजरात में 2007 में तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार में उन्हें महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री बनाया गया था.  गोधरा कांड के बाद हुई हिंसा की जांच कर रहे विशेष जांच दल ( एसआईटी ) ने उन्हें 2008 में नरोदा पाटिया और नरोदा गाम में हुए नरसंहार में आरोपी बनाया था. 

अगस्त 2012 में विशेष एसआईटी अदालत ने नरोदा पाटिया मामले में उनकी भूमिका को लेकर उन्हें 28 साल कैद की सजा सुनाई थी. उन्हें मार्च 2009 में गिरफ्तार किया गया था लेकिन जुलाई 2014 से वह जमानत पर थीं. 

(इनपुट – भाषा)

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शत्रुघ्न सिन्हा का ‘तेजस्वी’ तारीफ, कहा बिहार का इकलौता चेहरा है तेजस्वी यादव

बिहार के पटना में आयोजित राष्ट्रमंच सम्मेलन में वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने बीजेपी को छोड़ने की घोषणा की है. शत्रुघ्न सिन्हा ने  यशवंत सिन्हा के फैसले को सही ठहराया. इसके अलावा अपने संबोधन में उन्होंने तेजस्वी यादव की जमकर तारीफ की.

ज़ी न्यूज़ डेस्क
ज़ी न्यूज़ डेस्क | Updated: Apr 21, 2018, 05:03 PM IST

शत्रुघ्न सिन्हा का 'तेजस्वी' तारीफ, कहा बिहार का इकलौता चेहरा है तेजस्वी यादव

पटना में शत्रुघ्न सिन्हा ने तेजस्वी यादव की जमकर तारीफ की.

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UP Board Class 10th High School Exam Results 2018 Results to be declared at upresults nic in on 29th April

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (UPMSP) 10वीं और 12वीं के यूपी बोर्ड रिजल्ट 2018 के रिजल्ट 29 अप्रैल को जारी कर सकता है. ये नतीजे यूपी बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट upresults.nic.in पर सुबह 11 बजे से 12:30 के बीच घोषित किए जाएंगे.

ज़ी न्यूज़ डेस्क
ज़ी न्यूज़ डेस्क | Updated: Apr 21, 2018, 02:10 PM IST

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ड्रग माफिया के चंगुल में फंस रहे रोहिंग्‍या शरणार्थी!

कॉक्‍स बाजार(बांग्‍लादेश): म्‍यांमार के रखाइन प्रांत से विस्‍थापित हो रहे रोहिंग्‍या शरणार्थी ड्रग डीलरों के चंगुल में फंस रहे हैं. इस तरह के बेघर लोगों की मदद के बदले अंतरराष्‍ट्रीय ड्रग माफिया इनसे ड्रग्‍स की सप्‍लाई एक जगह से दूसरी जगह करने को कहते हैं. दरअसल हाल के वर्षों में रखाइन से लाखों मुस्लिम रोहिंग्‍या शरणार्थी बांग्‍लादेश और भारत जैसे मुल्‍कों में जा रहे हैं. झुंड की शक्‍ल में पहुंच रहे इन शरणार्थियों के माध्‍यम से ड्रग्‍स की सप्‍लाई को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाना डीलरों को आसान लग रहा है. इसमें खतरा कम है.

Zee मीडिया के अखबार DNA की एक्‍सक्‍लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक राशिद आलम(30) जैसे कई लोगों के परिवार इन ड्रग डीलरों के चंगुल में फंसे हुए हैं. आलम सितंबर, 2017 में बांग्‍लादेश पहुंचा था और कॉक्‍स बाजार एरिया के टेकनाफ शरणा‍र्थी शिविर में रह रहा है. दिसंबर में वह 35 हजार याबा टैबलेट्स के साथ पकड़ा गया. उसने बॉर्डर गार्ड बांग्‍लादेश(बीजीबी) को बताया कि वह दलालों के चंगुल में फंस गया था जिन्‍होंने उसके परिवार को म्‍यामांर से सुरक्षित निकालने और बांग्‍लादेश में रोजगार दिलाने का भरोसा दिया था. आलम मूल रूप से म्‍यांमार के डोंगखाली का रहने वाला है. उसको अभी भी अपने परिवार से मिलने की उम्‍मीद है. इस तरह के कई पुरुष, महिलाएं अंतरराष्‍ट्रीय ड्रग माफिया के ड्रग्‍स सप्‍लायर हो चुके हैं.

11.5 लाख रोहिंग्‍या शरणार्थी
बांग्‍लादेश में इस वक्‍त 11.5 लाख रोहिंग्‍या शरणार्थी रह रहे हैं. ज्‍यादातर ये लोग कॉक्‍स बाजार के शरणार्थी शिविरों में रहते हैं जोकि म्‍यांमार बाजार के निकट है. हर रोज म्‍यांमार से इनकी खेप आती रहती है. यहां के दो बड़े शरणार्थी केंद्रों कुटुपालोंग और बालूखाली में रोज एक नई झुग्‍गी डाली जाती है. इस तरह की झुग्गियां कई किमी दूर तक फैली हुई हैं. एक झुग्‍गी में केवल एक आदमी रह सकता है लेकिन उनमें चार लोग तक रहते हैं और बारी-बारी से सोते हैं. इस तरह की दयनीय दशा में रह रहे इन गरीब लोगों के लिए तमाम एनजीओ और युनाइटेड नेशंस हाई कमिश्‍नर फॉर रिफ्यूजीज भोजन का इंतजाम करता है लेकिन सब तक इसको पहुंचाना आसान नहीं है.

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बांग्‍लादेश में इस वक्‍त 11.5 लाख रोहिंग्‍या शरणार्थी रह रहे हैं.(फाइल फोटो)

दलाल इन लोगों को प्रलोभन देते हैं कि वे अपने वतन लौट जाएंगे या भारत एवं दक्षिण अफ्रीका में उनको नौकरी दिलाने का भरोसा देते हैं. बस इसके बदले ‘मैडनेस ड्रग्‍स’ भारतीय सीमा या बांग्‍लादेश के भीतर पहुंचानी होती है. इस बारे में बीजीबी के साउथ ईस्‍ट रीजन के कार्यकारी रीजनल कमांडर कनैल गाजी मो अहसानुजमां ने DNA से कहा, ”पिछले साल से याबा टैबलेट की स्‍मगलिंग में कई गुना बढ़ोतरी हुई है….हर रोज तकरीबन सवा करोड़ रुपये की याबा टैबलेट पकड़ी जा रही हैं, पहले यह कुछ लाख तक सीमित थीं.”  

पिछले महीने एक महिला से 52 करोड़ रुपये की इस तरह की टैबलेट पकड़ी गई है. बीजेबी के रीजनल डायरेक्‍टर ब्रिगेडियर जनरल एसएम रकीबुल्‍ला ने बताया कि ये लोग अपने जूते में छिपाकर इनको लाते हैं. अब हर कोई रोहिंग्‍या को संदेह की नजर से देखता है. उन्‍होंने बल देते हुए कहा कि इस मानवीय संकट का कोई न कोई स्‍थायी समाधान निकलना चाहिए क्‍योंकि इनको यहां पर इस तरह से लंबे समय तक नहीं रखा जा सकता. ये जितना ज्‍यादा यहां रहेंगे, ड्रग माफिया के चंगुल में फंसने के चांस उतने ही ज्‍यादा रहेंगे. उल्‍लेखनीय है कि म्‍यांमार और बांग्‍लादेश के बीच 271 किमी की सीमा है, जिसमें 45 किमी की नदी सीमा भी शामिल है. इसी तरह भारत और बांग्‍लादेश के बीच 4,427 किमी की सीमारेखा है जिसमें 234 किमी की नदी सीमा है.

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Terrorists of IS planned to attack Jews in Mumbai: Gujarat ATS

आरोपी मोहम्मद कासिम स्टीम्बरवाला और उबेद अहमद मिर्जा को यहां खड़िया क्षेत्र में एक यहूदी सिनेगॉग पर लोन वुल्फ हमला करने की योजना बनाने के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था.

ज़ी न्यूज़ डेस्क
ज़ी न्यूज़ डेस्क | Updated: Apr 21, 2018, 08:16 AM IST

मुंबई में यहूदियों पर लोन वुल्‍फ अटैक की थी तैयारी, वजह भी जानकर रह जाएंगे हैरान

आईएस के दो संदिग्‍ध आतंकियों ने मुंबई में हमला करने की योजना बनाई थी. (फाइल फोटो)

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what will be the role of 21st century india in Commonwealth । ZEE जानकारीः 21वीं सदी के शक्तिशाली भारत की Commonwealth में क्या भूमिका होनी चाहिए ?

ब्रिटेन में Common Wealth देशों का सम्मेलन आज खत्म हो गया है और इस मौके पर CommonWealth शब्द की ऐतिहासिक समीक्षा करना ज़रूरी है. इस तस्वीर को देखिए. ये Commonwealth देशों के राष्ट्रअध्यक्षों और प्रतिनिधियों की Group Photo है. इसमें सबसे आगे ब्रिटेन की महारानी Elizabeth Second हैं जो आज भी ब्रिटेन सहित 16 देशों की महारानी हैं, दूसरी पंक्ति में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और आखिरी पंक्ति में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाकान अब्बासी हैं.

इस तस्वीर को देखने के दो नज़रिए हैं, पहला नज़रिया ये है कि हम इस बात से खुश हो जाएं कि भारत के प्रधानमंत्री, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से आगे हैं. और दूसरा नज़रिया ये है कि भारत के प्रधानमंत्री, चाहे वो कोई भी हों, इस तस्वीर के केंद्र में कब आएंगे ? क्या भारत के लिए उपनिवेशवाद के प्रतीकों को तोड़कर, आगे बढ़ने का वक़्त आ गया है ? आज हमें इस सवाल का जवाब ढूंढना होगा कि 21वीं सदी के शक्तिशाली भारत की Common Weatlh में क्या भूमिका होनी चाहिए ?

Common Weatlh का जन्म ब्रिटेन के उपनिवेशवाद की ज़मीन पर हुआ है . वर्ष 1931 में उन देशों का एक संगठन बनाया गया जो ब्रिटेन के उपनिवेश थे . ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों में विकास के लिए इस संगठन का निर्माण किया था. लेकिन इसका एजेंडा सिर्फ विकास नहीं था, बल्कि इसमें ब्रिटेन की विस्तारवादी और सामंती मानसिकता की छाप थी. ब्रिटेन की महारानी आज भी CommonWeatlh की Head हैं .आज इस समूह में दुनिया के 53 देश शामिल हैं. दुनिया की करीब एक तिहाई आबादी Commonwealth देशों में रहती है.

Commonwealth देशों की 60 फीसदी आबादी की उम्र 30 वर्ष से कम है और इनमें रहने वाले करीब एक अरब लोगों की उम्र 25 साल से कम है. यानी इन देशों में युवा शक्ति का भंडार है.आज़ादी के आंदोलन में पंडित जवाहर लाल नेहरू सहित बहुत सारे नेताओं ने ये कहा था कि आज़ादी के बाद भारत Common Weatlh देशों का सदस्य नहीं रहेगा . क्योंकि भारत की संस्कृति ना तो साम्राज्यवाद और विस्तारवाद पर भरोसा करती है और ना ही इसका समर्थन करती है . आज़ादी के बाद कूटनीतिक मजबूरियों की वजह से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने Common Wealth का सदस्य होना स्वीकार कर लिया था. लेकिन आज भी कुछ ऐसी परंपराएं हैं जिसको खत्म होना चाहिए . 

बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि ब्रिटेन की महारानी आज भी आधिकारिक रूप से 16 देशों की महारानी और Head of State यानी राष्ट्र अध्यक्ष हैं. इनमें तीन सबसे प्रमुख देश हैं – Canada, Australia और New Zealand आपने Common Wealth Games के बारे में बहुत कुछ पढ़ा और सुना होगा. और इस बार तो आपने इन खेलों में भारत का शानदार प्रदर्शन भी देखा होगा. लेकिन वर्ष 1966 से पहले Common Wealth Games को British Empire Games कहा जाता था . ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों में खेल को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1930 में British Empire Games की शुरुआत की थी. और 1966 में इसका नाम बदलकर Common Wealth Games कर दिया गया .

बड़ी बात ये है कि Common Wealth Games का उद्घाटन हर बार या तो ब्रिटेन की महारानी करती हैं या फिर ब्रिटेन के राजपरिवार का कोई सदस्य करता है. इस परंपरा में अब तक कोई बदलाव नहीं आया. और बहुत से लोग अब इस पर भी सवाल उठाने लगे हैं. आज़ादी के बाद भारत ने Common Wealth का सदस्य बनना क्य़ों स्वीकार किया ? इसका भी बहुत दिलचस्प इतिहास है और हमने इस पर एक रिपोर्ट तैयार की है. इसे देखकर आपकी आंखें खुल जाएंगी. और आपके कई भ्रम दूर हो जाएंगे. Commonwealth एक बहुत शक्तिशाली समूह है.

लेकिन इस शक्ति का मुकुट आज भी ब्रिटेन की महारानी के सिर पर है. राजा रानी का ज़माना भले ही गुज़र चुका हो, लेकिन Commonwealth में ब्रिटेन की महारानी की भूमिका को एक सांकेतिक प्रतीक के तौर पर ज़िंदा रखा गया है. इसलिए ये एक तरह का Soft एजेंडा है. आर्थिक रूप से भले ही आज ब्रिटेन को भारत की ज़रूरत हो लेकिन वैचारिक रूप से Commonwealth को राजा और प्रजा वाला समूह बनाकर रखा गया है. 

एक ज़माने में कहा जाता था कि ब्रिटिश राज का कभी सूर्यास्त नहीं होता, लेकिन आज ब्रिटेन का आर्थिक सूर्यास्त हो रहा है और भारत उदय हो रहा है इसलिए अब वक़्त आ गया है कि भारत को इसमें एक लीडर की भूमिका में आ जाना चाहिए. 53 देशों के इस समूह का नेतृत्व करने से भारत का प्रभाव बहुत बढ़ जाएगा और भारत की व्यापारिक शक्ति बहुत बढ़ जाएगी. ये सुपरपावर और विश्वगुरू बनने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है.

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मौसम विभाग की चेतावनी: ओडिशा, पश्चिम बंगाल के तटों पर चलेंगी तेज हवाएं

नई दिल्ली: मौसम विभाग ने पश्चिम बंगाल, ओडिशा , पश्चिमी तट के दक्षिणी हिस्सों और लक्षद्वीप के तटों पर तेज हवाओं के चलने और समुद्र के अशांत रहने की चेतावनी दी है और मछुआरों को समुद्र में नहीं जाने की सलाह दी है. मौसम विभाग ने कहा कि पश्चिम बंगाल और ओडिशा के तटों पर 40-50 किलोमीटर प्रति घंटे की तेज हवाएं चल सकती हैं और समंदर अशांत रह सकता है. इसने अपनी चेतावनी में कहा है कि मछुआरों को सलाह दी जाती है कि वे इन तटों से समुद्र में नहीं जाएं. भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केन्द्र ने अपनी चेतावनी में कहा है कि भारत के पश्चिमी तट और लक्षद्वीप से लगते तटों पर लहरें उठने की संभावना है.

आईएनसीओआईएस पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने एक संस्थान है, जो सुनामी और समुद्र में उथल-पुथल के बारे में जानकारी देता है. मौसम विभाग ने कहा कि पश्चिम बंगाल के उप हिमालय क्षेत्र, सिक्किम, झारखंड, पश्चिम बंगाल का गंगा का क्षेत्र, ओडिशा, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, दक्षिण छत्तीसगढ़ और केरल के अलग अलग इलाके में आंधी तूफान आने और गरज के साथ बारिश होने की संभावना है. दक्षिण असम , मेघालय , मिजोरम और त्रिपुरा में भारी बारिश की कम संभावना है.  

अक्षय तृतीया के दिन मौसम और देश के मिजाज को लेकर हुईं खास भविष्यवाणियां
क्या आपने कभी सोचा है कि जब मौसम विभाग नहीं था तब बारिश के बारे में कौन बताता होगा. भारत में मौसम विभाग के पहले लोग मौसम की भविष्यवाणी मंदिरों और पंचांगों के जरिए सुनते थे. ये परंपराएं आज भी प्रचलित हैं और काफी मान्य हैं. देश के कई इलाकों में बोवनी का कार्य इन्हीं पर निर्भर होता है. ऐसी ही एक श्रध्दापूर्ण परंपरा महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में पिछले करीब 350 वर्षों से चलती आ रही है. अक्षय तृतीया के दिन यहां के वाघ महाराज परिवार के लोग बारिश की भविष्यवाणी करते हैं. इसके साथ ही वहां देश की आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक बदलाव और मौसम की भविष्यवाणी की जाती है. सालाना होने वाले इस धार्मिक प्रक्रिया को यहां के लोग बहुत मानते हैं और उसके अनुसार अपने काम का नियोजन करते हैं.

भविष्यवाणी के मुताबिक होती है पूरे साल की प्लानिंग
विदर्भ के बुलढाणा स्थित भेंडवड़ गांव में इस आयोजन के लिए और भविष्यवाणी सुनने के लिए भारी भीड़ लगती है. जहां धार्मिक विधि के बाद देश का भविष्य बताया जाता है. भेंडवड़ गांव में पिछले करीब 350 सालों से भी ज्यादा लंबे समय से यह विधि चलती आ रही है. अक्षय तृतीया के दिन वाघ महाराज परिवार के लोग यह विधि करते हैं. जिसके बाद उस साल के लिए मौसम, राजनीति और आर्थिक भविष्यवाणी की जाती है. इसे सुनने के लिए लोग काफी संख्या में इकट्ठा होते हैं. जब वाघ महाराज परिवार अपनी यह भविष्यवाणी बताते हैं तो लोग ध्यान लगाकर सुनते हैं और फिर अगले पूरे साल की प्लानिंग उसी भविष्यवाणी के तहत की जाती है.

इनपुट भाषा से भी 

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