Analysis, Media Trial Supreme Politics in Supreme Court, 4 Judges Press Conference

सर्वोच्च न्यायालय में आज सर्वोच्च स्तर की राजनीति हुई. सुप्रीम कोर्ट में आज वो हो गया जो भारत में आज से पहले कभी नहीं हुआ था.. न्यायाधीश आज खुद.. याचिकाकर्ता बन गये और न्याय की गुहार लगाने लगे और पूरा देश सुप्रीम कोर्ट के चार My Lords को इस रूप में देखकर हैरान रह गया. सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जज, आज मीडिया की अदालत में आ गये.. और सीधे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने लगे. भारत में सुप्रीम कोर्ट का एक बहुत बड़ा रुतबा है. सुप्रीम कोर्ट, देश के हर छोटे-बड़े मुद्दे में ज़रूरी हस्तक्षेप करता है और लोग भी सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा करते हैं. लेकिन आज जो कुछ हुआ है.. उसने सुप्रीम कोर्ट जैसे Institution की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं. हमारे देश में बात बात पर Contempt of Court  यानी अदालत की अवमानना का ज़िक्र होता है.. लेकिन आज इसी शब्द की गंभीरता पर सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया है. भारत में लोग बड़े विश्वास के साथ ये कहते हैं कि हम सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे.. आज इसी विश्वास को धक्का लगा है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. और इस लोकतंत्र के चार मुख्य स्तंभ हैं. कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया. लोकतंत्र के तीन स्तंभों पर बार बार सवाल उठते हैं. लेकिन एक स्तंभ विवादों से अब तक दूर रहा है और वो है – न्यायपालिका यानी Judiciary.. लेकिन आज हमारे देश की न्यायपालिका पर भी सवाल उठ गए हैं. और ये सवाल किसी और ने नहीं बल्कि खुद सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों ने उठाए हैं. आज सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर सवाल उठाने के लिए Media का सहारा लिया. देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के Sitting Judge प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपनी पीड़ा बता रहे थे. इन 4 जजों की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से पूरा देश हैरान हो गया. आप भी आज दोपहर से ये पूरी ख़बर देख रहे होंगे. लेकिन आपको ये पता नहीं चला होगा कि इन जजों की परेशानी क्या है और वो क्या कहना चाहते हैं? इसलिए आज हम साधारण भाषा में आपके लिए न्यायपालिका का ये पूरा विवाद Decode करेंगे. सबसे पहले आपको इन चार जजों के नाम बताते हैं. 

इनके नाम हैं  – जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ.

सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice दीपक मिश्रा के बाद ये चारों जज सुप्रीम कोर्ट में सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश हैं. आज दोपहर में इन चारों जजों ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में Chief Justice दीपक मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाए. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन चारों जजों ने आज से दो महीने पहले जस्टिस दीपक मिश्रा को लिखी गई एक चिट्ठी भी सार्वजनिक की. इस चिट्ठी में जजों ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं. इन जजों ने लिखा है कि वो इस चिट्ठी को बहुत ही चिंता और पीड़ा के साथ लिख रहे हैं. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ ऐसे फैसले दिए गए, जिससे न्याय व्यवस्था प्रभावित हुई है. 

और इन फैसलों से High Courts की स्वतंत्रता भी खतरे में पड़ी है. इस चिट्ठी में लिखा गया है कि कौन से जज या बेंच को कौन सा केस दिया जाना है, ये भारत के मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार है. और केस के हिसाब से ही वो बेंच या जज तय करते हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में पक्षपात हो रहा है. इन जजों ने लिखा है कि चीफ जस्टिस को ये विशेषाधिकार इसलिए दिया गया है ताकि सुप्रीम कोर्ट का काम अनुशासन में रहे और काम अच्छी तरह हो. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि चीफ जस्टिस की अपने साथी जजों के ऊपर कोई Legal या Superior Authority है. इन जजों ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है. और वो ये है कि देश के न्यायशास्त्र में ये बात स्थापित है कि सभी जज बराबर हैं और मुख्य न्यायाधीश इनमें सबसे पहले हैं, वो ना तो किसी जज से ज्यादा हैं और ना ही कम. जजों की शिकायत है कि सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा व्यवस्था में इन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है. 

उनका कहना है कि ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जब मुख्य न्यायाधीश ने देश को प्रभावित करने वाले मामलों को अपनी पसंद की बेंच को Refer कर दिया. 7 पन्नों की इस चिठ्ठी में जजों ने लिखा है कि वो सुप्रीम कोर्ट को शर्मनाक स्थिति से बचाने के लिए इन मामलों के बारे में नहीं बता रहे हैं. और ये भी कहा कि अगर वो आज अपनी ज़ुबान बंद रखेंगे.. तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा.. और इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा.

कुल मिलाकर आज ऐसा लग रहा था कि जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज ही याचिकाकर्ता बन गए हों और न्याय की गुहार लगा रहे हों. लेकिन सवाल ये है कि क्या इन जजों के पास यही आखिरी विकल्प था? क्या इस विवाद का हल निकालने का कोई दूसरा तरीका नहीं था? 
इन जजों का कहना है कि उन्होंने चीफ जस्टिस से मिलकर इस विवाद को सुलझाने की कोशिश की और आज सुबह भी वो चीफ जस्टिस से मिले थे. लेकिन जब इसका हल नहीं निकला तो वो जनता की अदालत में आए हैं. यहां सवाल ये है कि अगर देशभर के High Courts और Lower Courts के जज भी ऐसे ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सवाल उठाने लगे तो फिर क्या होगा.  

आज तक न्यायपालिका पर कभी भी सवाल नहीं उठे हैं. लेकिन आज की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस ने बहुत से डिज़ाइनर वकीलों और नेताओं को खुश होने का मौका दे दिया है. जजों के इस टकराव पर देश में राजनीति शुरू हो चुकी है. और इस टकराव को इस तरह पेश किया जा रहा है, जैसे भारत का लोकतंत्र खतरे में हो. लेकिन आज शाम को एक ऐसी तस्वीर भी आई, जिसके बाद जजों की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल उठने लगे. 

ये तस्वीरें CPI के नेता डी राजा की हैं. आज डी राजा ने जस्टिस चेलमेश्वर से उनके घर पर जाकर मुलाकात की. हो सकता है कि जस्टिस चेलमेश्वर और डी राजा एक दूसरे को पहले से जानते हों.  लेकिन ऐसे वक्त में उन्होंने डी राजा जैसे राजनीतिक व्यक्ति से मुलाकात क्यों की? हालांकि डी राजा का कहना है कि वो चाहते हैं कि जजों की नाराज़गी के इस मामले पर संसद में बहस हो.

इस बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इस विवाद का फायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं. ममता बनर्जी ने Tweet किया है.. और कहा कि केन्द्र सरकार का न्यायपालिका में ज़रूरत से ज़्यादा हस्तक्षेप लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस मुद्दे को हवा दी. यानी अब नेता इस विवाद का पूरा राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं. और इसके लिए केन्द्र सरकार पर सवाल उठा रहे हैं. लेकिन हमारे सूत्रों के मुताबिक सरकार इस पूरे विवाद से खुद को दूर रख रही है. सरकार का मानना है कि ये न्यायपालिका का आपसी विवाद है, और इससे जजों को खुद ही निपटना चाहिए. 

आज दिन में एक और दिलचस्प तस्वीर देखने को मिली. जब ये चारों जज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे, तो जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस गोगोई आपस में बात कर रहे थे. तभी उनके पीछे खड़ी एक महिला रिपोर्टर उनकी बातें सुनने की कोशिश करने लगी. लेकिन जस्टिस चेलमेश्वर ने उस महिला रिपोर्टर को टोंक दिया और उसे ये भी बता दिया कि वो उनकी बातें सुनने की कोशिश न करें.

देश की न्यायपालिका पर इस वक्त बहुत बोझ है. आंकड़ों के मुताबिक 2016 तक पूरे देश की अदालतों में करीब 3 करोड़ 15 लाख केस लंबित थे. इनमें से 40 लाख से ज्यादा मामले हाईकोर्ट में और करीब 2 करोड़ 75 लाख मामले निचली अदालतों में लंबित हैं. जबकि 1 नवंबर 2017 तक सुप्रीम कोर्ट में 55 हज़ार से ज्यादा मामले लंबित पड़े हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट में इस वक्त चीफ जस्टिस को मिलाकर 25 जज हैं. जबकि उनकी संख्या 31 होनी चाहिए. इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट के जजों पर काम का बहुत बोझ है. अब आपको ये भी समझना चाहिए कि मुख्य न्यायाधीश और इन 4 जजों के बीच का विवाद इतना कैसे बढ़ गया ?

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने एक मेडिकल कॉलेज को मान्यता देने के लिए हुए घूसकांड के मामले में बड़ी बेंच गठित करने के, जस्टिस चेलमेश्वर के एक आदेश को रद्द किया था. इसके पीछे जस्टिस दीपक मिश्रा का तर्क ये था कि कि सुप्रीम कोर्ट में बेंच गठित करने का अधिकार सिर्फ़ चीफ जस्टिस के पास है. जस्टिस चेलमेश्वर ने इस घूसकांड के मामले में पांच जजों की संविधान पीठ के गठन का आदेश दिया था.. लेकिन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने.. जस्टिस चेलमेश्वर का आदेश रद्द कर दिया.. और कहा कि ये उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस मामले को दूसरी बेंच को भेज दिया था.

मुख्य रूप से इसी घटनाक्रम के बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस चेलमेश्वर के बीच विवाद हुआ. हालांकि ये किसी ने नहीं सोचा था कि ये विवाद मीडिया की अदालत में पहुंच जाएगा. 
सवाल ये है कि सुप्रीम कोर्ट के 4 Judges को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की क्या ज़रूरत थी ? इन Judges ने अपनी कुछ आपत्तियां.. एक चिठ्ठी में लिखी थी.. और वो चिठ्ठी मुख्य न्यायाधीश को दे दी थी. वो चाहते तो चीफ जस्टिस से एक बार और मिलने की कोशिश कर सकते थे… बातचीत की प्रक्रिया को और मौका दे सकते थे और संतुष्ट ना होने पर राष्ट्रपति को भी चिठ्ठी लिख सकते थे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. और इन जजों ने खुद ही मीडिया ट्रायल शुरू कर दिया. इस पूरे घटनाक्रम की वजह से न्यायपालिका पर आम आदमी के अटूट विश्वास को भी गहरा झटका लगा है.

बहुत बार हमारे देश में ऐसा हुआ है कि जब सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को देखकर लोगों ने ये कहा है कि शुक्र है कि सुप्रीम कोर्ट है. और इसी वजह से पूरे देश के लोगों की सुप्रीम कोर्ट में अटूट आस्था है. लेकिन आज के घटनाक्रम से लोगों के इस विश्वास को ठेस पहुंची है. देश के इतिहास में बहुत बार ऐसा हुआ है जब सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच सीधा टकराव रहा हो. पिछले 30 वर्षों में ताकत के हिसाब से सुप्रीम कोर्ट किसी भी प्रधानमंत्री या संसद से ज़्यादा असरदार था. 

और इसकी वजह ये थी कि 2014 से पहले के 30 वर्षों में देश में कोई भी पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बनी थी. इस दौरान हमेशा गठबंधन की सरकारें रहीं. और इसी वजह से हर छोटे-बड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप बना रहा. आखिरी बार 1984 में देश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी. 1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने थे. और उस वक्त उन्हें लोकसभा की 404 सीटों पर जीत मिली थी. 

इसके बाद देश में गठबंधन की सरकारें रहीं.. पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बनने की वजह से प्रधानमंत्री और सरकारें कमज़ोर रही.. और सुप्रीम कोर्ट मज़बूत रहा. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला. लोकसभा में बीजेपी को 282 सीटों पर जीत मिली थी. और यही वजह है कि सरकार मज़बूत है. और इसी वजह से पिछले तीन वर्षों में हमें कई बार सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव भी देखने को मिला है 

अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका को खारिज कर दिया था. 2014 के NJAC एक्ट को असंवैधानिक बताया था.. और जजों की नियुक्ति के Collegium सिस्टम को बरकरार रखा था. यहां आपको बता दें कि Collegium का मतलब होता है सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे वरिष्ठ जजों का समूह.. जो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति की सिफारिश करता है.

इसके अलावा 2016 में जब केन्द्र सरकार ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाया था, तो उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन हटाकर Floor Test करवाने का आदेश दिया था. जिसमें कांग्रेस जीत गई थी और हरीश रावत एक बार फिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन गए थे. और फिर जुलाई 2016 में भी सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले को रद्द कर दिया था. ये वो मामले थे, जिनमें केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच सीधा टकराव देखने को मिला था. 

हमारे देश के सिस्टम को Contempt of Court यानी अदालत की अवमानना करने की आदत बहुत पहले से लगी हुई है. सुप्रीम कोर्ट के बहुत से फैसलों का हमारे देश के सिस्टम और लोगों ने पालन नहीं किया. दिल्ली में यमुना के किनारे अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट रोक लगा चुका है. लेकिन इसके बावजूद यमुना के किनारे धड़ल्ले से अवैध निर्माण हो रहा है. प्रदूषण को लेकर बार बार सुप्रीम कोर्ट आदेश जारी करता है. लेकिन इन आदेशों का भी पालन नहीं होता. यहां तक कि पिछले वर्ष दीवाली से पहले दिल्ली और NCR में पटाखे बेचने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई थी, लेकिन दीवाली पर पटाखे बेचे गये और जलाए भी गये.

 यानी हमारे देश का सिस्टम और यहां के लोग बार बार Contempt of Court करते रहते हैं. हमारे देश में दबी ज़ुबान में ये कहा जाता है कि Judiciary में बहुत भ्रष्टाचार है.. लेकिन कोर्ट की अवमानना के डर से कोई भी ये बात खुलकर नहीं बोलता था.. और ना ही ये बात मीडिया में सामने आती थी.. लेकिन आज Contempt of Court यानी अदालत की अवमानना जैसा शब्द खुद ही अपमानित हो गया.

सुप्रीम कोर्ट के 4 Judges जिस तरह मीडिया की अदालत में आ गये.. उससे कई सवाल उठते हैं, आज जो कुछ भी हुआ.. उसके पीछे सिर्फ ये चार जज हैं.. या फिर इन Judges के पीछे भी कोई और बड़ी ताकत है? इस पूरे मामले पर हमारी नज़र है.. आने वाले दिनों में हम आपको बताएंगे कि ये सब क्यों हुआ?

हमारे देश में दबी ज़ुबान में ये कहा जाता है कि Judiciary में बहुत भ्रष्टाचार है.. लेकिन कोर्ट की अवमानना के डर से कोई भी ये बात खुलकर नहीं बोलता था.. और ना ही ये बात मीडिया में सामने आती थी.. लेकिन आज Contempt of Court यानी अदालत की अवमानना जैसा शब्द खुद ही अपमानित हो गया. सुप्रीम कोर्ट के 4 Judges जिस तरह मीडिया की अदालत में आ गये.. उससे कई सवाल उठते हैं. आज जो कुछ भी हुआ.. उसके पीछे सिर्फ ये चार जज हैं.. या फिर इन Judges के पीछे भी कोई और बड़ी ताकत है? इस पूरे मामले पर हमारी नज़र है.. आने वाले दिनों में हम आपको बताएंगे कि ये सब क्यों हुआ?

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