Zee जानकारी : लोगों ने भारी डिस्काउंट के लालच में खरीदे लाखों ज़हरीले वाहन

नई दिल्ली : सबसे पहले मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं। सवाल ये है कि अगर आपको कोई ज़हर भारी डिस्काउंट पर मिलने लगे तो क्या आप उसे खरीदेंगे? मुझे पूरा यकीन है कि आपमें से कोई भी ऐसा नहीं होगा जिसका जवाब हां में हो। लेकिन सच ये है कि हमारे देश में लोग भारी डिस्काउंट के लालच में ऐसा सामान भी खरीद लेते हैं। जो लाखों लोगों की मौत की वजह बनता है। हम BS-3 तकनीक पर आधारित वाहनों की बात कर रहे हैं। BS-3 तकनीक पर आधारित वाहनों को वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन आज देश भर के लोगों ने भारी डिस्काउंट के लालच में लाखों ज़हरीले वाहन खरीद लिए हैं।

दरअसल, 29 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि पूरे भारत में 1 अप्रैल 2017 से BS-3 तकनीक पर आधारित कोई भी वाहन ना तो बेचा जाएगा और ना ही उसका रजिस्ट्रेशन होगा।

BS का मतलब होता है – भारत स्टेज. ये इमीशन का एक मानक है। जिससे तय होता है कि कोई वाहन कितना प्रदूषण फैलाता है। अभी तक भारत में दिल्ली-NCR के अलावा सिर्फ 13 शहर ऐसे हैं जहां BS 4 से नीचे के मानकों पर आधारित वाहन बेचना गैरकानूनी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 1 अप्रैल से देश के किसी भी शहर में BS 3 वाहनों की बिक्री बंद हो जाएगी। भारत में इमीशन के लिए भारत स्टेज मानकों की शुरुआत वर्ष 2000 में हुई थी। और तब से लेकर अब तक BS-1, BS-2, BS-3 और BS 4 मानकों पर आधारित वाहन बाज़ार में आ चुके हैं। 

भारत स्टेज…इमीशन के यूरोपीयन रेगुलेशंस पर आधारित है। आपको बता दें कि अमेरिका और यूरोप के देशों में जो नए वाहन बेचे जा रहे हैं वो यूरो 6 तकनीक पर आधारित हैं। यानी भारत से दो कदम आगे। आपको जानकर हैरानी होगी कि यूरोप में इमीशन के मानक के तौर पर यूरो 6 की शुरुआत वर्ष 2014 में ही हो गई थी। जबकि भारत में BS-6 वाहनों के लिए डेडलाइन वर्ष 2020 रखी गई है। यानी जब तक भारत BS-6 तक पहुंचेगा तब तक यूरोप में ऐसे वाहन आने लगेंगे जो नाम मात्र का प्रदूषण फैलाते हैं। 

यहां आपको ये जानकारी भी दे दें कि BS-6 से पहले BS -5 मानक लाए जाने की तैयारी थी लेकिन बढ़ते प्रदूषण के देखते हुए इसे स्किप कर दिया गया है। यानी BS-4 के बाद भारत में सीधे BS-6 लाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ऑटोमोबाइल कंपनियों को BS-3 वाहनों से जुड़ी 1 अप्रैल 2017 की डेडलाइन के बारे में पता था। जबकि कंपनियों का कहना है कि उन्हें सिर्फ इस बात की जानकारी थी 1 अप्रैल 2017 से उन्हें BS-3 वाहनों का उत्पादन नहीं करना है। 

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने से पहले कंपनियों के स्टॉक में BS-3 पर आधारित वाहनों की संख्या लगभग 9 लाख थी। सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैनुफैक्चरर्स के मुताबिक इन वाहनों की कुल कीमत करीब 12 हज़ार करोड़ रुपये है। ज़ाहिर है भारत में कंपनियां लोगों की जान की कीमत पर भी नुकसान नहीं उठाना चाहती हैं। इसलिए कंपनियों ने 31 मार्च की डेडलाइन खत्म होने से पहले इन वाहनों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। इसके लिए इन कपंनियों ने ग्राहकों को भारी डिस्काउंट का लालच दिया। आज भी देश के बड़े बड़े अखबारों में ऑटोमोबाइल कंपनियों ने पूरे पन्ने के विज्ञापन दिए। 
इन विज्ञापनों के ज़रिए लोगों को बताया गया कि अगर वो आज वाहन खरीदेंगे तो उन्हें 12 हज़ार 500 रुपये से लेकर 22 हज़ार रुपये तक की छूट दी जाएगी। लेकिन इन कंपनियों ने इन विज्ञापनों में ये कहीं नहीं लिखा कि ये छूट इसलिए दी जा रही है क्योंकि उनके वाहन BS-3 पर आधारित है। कंपनियां जानती थीं कि अगर ये वाहन नहीं बिके तो कल से इनकी कोई कीमत नहीं रह जाएगी।

कंपनियों ने नवरात्रि के डिस्काउंट के नाम पर ये ऑफर्स आम लोगों को दिए और लोगों ने भी सुबह से ही शोरूम्स के बाहर लाइनें लगाना शुरू कर दिया। हमारी टीम ने जब दिल्ली के एक शोरूम के मालिक से बात की तो उसनें हमें बताया कि उसके शोरूम में 40 दोपहिया वाहन थे और आज ये 40 वाहन सिर्फ 40 मिनट में बिक गए। ऐसा सिर्फ दिल्ली में नहीं, देश के कई छोटे-बड़े शहरों में बड़े पैमाने पर हुआ।

यानी कंपनियों के इस अनैतिक डिस्काउंट के चक्कर में लोगों ने वो वाहन खुशी-खुशी खरीद लिए जो मानकों से ज़्यादा प्रदूषण फैलाएंगे और आने वाले समय में भारत में लाखों लोगों की जान ले लेंगे।  

मशहूर जर्नल द लैंसेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वायु प्रदूषण से हर साल 10 लाख लोगों की मौत होती है। सबसे ज्यादा लोगों की जान प्रदूषण के PM 2.5 कणों की वजह से जाती है। IIT कानपुर की एक स्टडी के मुताबिक PM 2.5 कणों के प्रदूषण में वाहनों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत है। यानी सीधा गणित लगाया जाए तो भारत में 2 लाख लोग वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण की वजह से मारे जाते हैं। आज कंपनियों ने BS-3 तकनीक पर आधारित जिन 9 लाख वाहनों को बेचने की कोशिश की है। वो सिर्फ वाहन नहीं बल्कि दो और चार पहियों पर दौड़ने वाला ज़हर है। इन वाहनों में 96 हज़ार से ज्यादा कॉमर्शियल वाहन, 6 लाख 71 हज़ार से ज्यादा टू ह्वीलर्स और 40 हज़ार से ज्यादा पैसेंजर्स कार शामिल हैं। 

स्टॉक क्लियर करने के नाम पर वाहनों को भारी डिस्काउंट पर बेचना कोई अपराध नहीं है लेकिन हमें लगता है कि ये एक तरह का नैतिक भ्रष्टाचार है। इसी तरह भारी डिस्काउंट के लालच में वाहन खरीदने पर किसी को सज़ा नहीं दी जा सकती लेकिन ये एक तरह का लालच ज़रूर है। क्योंकि BS-3 तकनीक पर आधारित जिन वाहनों को खरीदा और बेचा गया है वो जब सड़कों पर चलेंगे तो प्रदूषण फैलाएंगे। प्रदूषण बढ़ेगा तो लोगों की जान जाएगी और प्रदूषण, वाहन खरीदने वालों की जान भी ले सकता है और वाहन बेचने वालों की भी।

ये हाल तब है जब सरकार खुद ये मानती है कि भारत में वायु प्रदूषण के हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। कुछ दिनों पहले सरकार ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि दिल्ली, फरीदाबाद, वाराणसी, लखनऊ और जयपुर देश के सबसे प्रदूषित शहर हैं। एयर क्वालिटी इंडेक्स के मुताबिक 1 मई 2015 से लेकर मार्च 2017 के बीच दिल्ली वालों को एक दिन के लिए भी साफ हवा नसीब नहीं हुई। यानी 2 साल से लगातार दिल्ली वाले उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं जब उन्हें साफ हवा मिल पाएगी। 665 दिनों में से सिर्फ 47 दिन ऐसे थे जब दिल्ली की हवा कुछ बेहतर थी। हालांकि इन 47 दिनों की हवा को भी सुरक्षित नहीं कहा जा सकता।

वाहन कंपनियों को अच्छी तरह पता था, कि उन्हें BS-3 तकनीक पर आधारित वाहन बेचना बंद कर देना चाहिए। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वाहन कंपनियों का इंजन मुनाफे वाले पेट्रोल से चलता है और BS-4 जैसी तकनीक लाने के लिए उन्हें ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसी लालच की वजह से वाहन कंपनियों ने BS-4 तकनीक को एक तरह से वैचारिक हैंड ब्रेक लगाकर रोका हुआ था। ज्यादातर लोगों को शायद BS-3 या BS-4 तकनीक के बारे में नहीं पता होगा। कंपनियां, लोगों को लुभावने विज्ञापनों के ज़रिए लालच देती हैं और लोग ऐसे वाहन खरीद लेते हैं, जो सिर्फ ज़हर उगलते हैं। अखबार में नवरात्रि के शुभ आरंभ के नाम पर डिस्काउंट का ऑफर देना कोई अपराध नहीं है। लेकिन अगर कंपनियां साफ साफ बता देतीं कि वो ये डिस्काउंट इसलिए दे रही हैं क्योंकि 1 अप्रैल से उनके वाहन अवैध हो जाएंगे तो शायद ये एक अच्छी शुरुआत होती लेकिन कंपनियों ने हमेशा की तरह ऐसा नहीं किया। इसी तरह अगर वाहन खरीदने वाले आम लोग थोड़ी सी समझदारी दिखाते और लालच नहीं करते तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती थी। 

उत्सर्जन मानकों को लेकर दुनिया की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी वॉक्सवैगन भी बहुत बदनाम रही है। 

जर्मनी के वॉक्सवैगन ग्रुप ने ये स्वीकार किया था कि उसने वर्ष 2008 से लेकर 2015 तक अमेरिका और यूरोप में 1 करोड़ 10 लाख ऐसी कारें बेची थीं, जिनमें खराबी थी। ये कारें चार गुना ज्यादा नाइट्रिक ऑक्साइड नाम का प्रदूषित धुंआ छोड़ रही थीं और कंपनी ने बड़ी ही चालाकी से इन कारों में एक ऐसा डिवाइस फिट किया हुआ था, जिससे ये कारें तमाम टेस्ट्स में पास हो जाती थीं। हालांकि, बाद में वॉक्सवैगन की इस चालाकी के बारे में दुनिया को पता चल गया। अमेरिका ने इस अपराध के लिए वॉक्सवैगन पर करीब 28 हज़ार करोड़ रुपये का ज़ुर्माना लगाया था। ज़रा सोचिए, क्या ऐसा भारत में हो सकता है। लेकिन इतने वर्षों में इन कारों ने जो प्रदूषण फैलाया, उससे हज़ारों लोगों की मौत होनी तय है। 

अमेरिका के MIT के वैज्ञानिकों ने इस बात पर बाकायदा रिसर्च किया गया कि वॉक्सवैगन कंपनी द्वारा उनके देश में बेची गईं करीब 4 लाख 80 हज़ार कारों से निकले प्रदूषण की वजह से कितने लोगों की मौत होगी? इस रिसर्च में पता चला कि इससे अमेरिका में कम से कम 60 लोगों की प्री-मेच्योर डेथ हो जाएगी यानी 60 लोग वक्त से पहले ही मर जाएंगे। लेकिन ये कारें अमेरिका के अलावा यूरोप में भी बेची गईं थीं। शोधकर्ताओं ने ये पाया कि इन वर्षों के दौरान पूरे यूरोप में वॉक्सवैगन की प्रदूषित कारों की वजह से 1200 लोगों की मौत वक्त से पहले ही हो जाएगी। 

इनमें से 500 लोगों की मौत तो अकेले जर्मनी में होने की आशंका जताई गई है। क्योंकि वॉक्सवैगन कंपनी जर्मनी की ही है और उसने अपने देश में करीब 26 लाख ऐसी कारें बेची थीं जो ज़्यादा प्रदूषण फैलाती थीं। लेकिन अभी भी वॉक्सवैगन ने बड़ी संख्या में कारें वापिस नहीं ली हैं। ऐसे में इस बात पर भी रिसर्च किया गया है कि अगर वॉक्सवैगन इस वर्ष के अंत तक पूरे यूरोप से अपनी कारें वापिस ले लेता है तो 2 हज़ार 600 लोगों को वक्त से पहले मरने से बचाया जा सकता है। 

यानी अमेरिका और यूरोप में कार बनाने वाली एक कंपनी ने गड़बड़ की और वहां के लोगों ने ये भी बता दिया कि इस कंपनी की गड़बड़ से कितने लोगों की मौत होगी। जबकि भारत में इन दो दिनों में लाखों ऐसी गाड़ियां बिक चुकी हैं जो ज़रूरत से ज़्यादा प्रदूषण फैलाएंगी, लेकिन हमारे पास ये जानने का कोई फॉर्मूला नहीं है कि इन प्रदूषित गाड़ियों से भारत में कितने लोगों की ज़िंदगी पर असर पड़ेगा। 

कुल मिलाकर आज जो कुछ भी हुआ वो निराशाजनक था आज भारत के लोगों ने ये बता दिया कि वो पर्यावरण को साफ करने की ज़िम्मेदारी कभी नहीं उठाना चाहते। भारत के लोगों को पर्यावरण से कोई लेना देना नहीं हैं। उनके लिए पांच, दस या बीस हज़ार रुपये बचाना ज़्यादा ज़रूरी है प्रदूषण फैले या ना फैले इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। हंमारे देश के लोगों को लगता है कि पर्यावरण की रक्षा करना सिर्फ सरकार और सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी है.. 

यहां नोट करने वाली बात ये भी है कि जो लोग आज BS-3 वाहन खरीद रहे थे वो अति गरीब नहीं हैं, उन्हें तत्काल इन वाहनों को खरीदने की कोई ज़रूरत नहीं थी। ये वो लोग हैं जिनके पास इतना पैसा था कि वो अचानक डिस्काउंट मिलने पर कोई वाहन खरीद सकें। ये मध्यम वर्ग के लोग थे और इन लोगों ने आज बता दिया कि उनकी सोच कितनी प्रदूषित है ये भारत के लोगों के चरित्र का एक DNA टेस्ट था जिसमें वो फेल हो गये हैं।

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