Zee जानकारी: सचिन और रेखा को…किसी ने संसद में क्यों नहीं देखा?

सम्मान पाया नहीं जाता, कमाया जाता है. फिर वो चाहे किसी भी क्षेत्र में क्यों ना हो. जैसे सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट की दुनिया में सम्मान कमाया और रेखा ने फिल्मों की दुनिया में. लेकिन सम्मान कमाने में जितना लंबा वक्त लगता है. उसे ठेस पहुंचाने में उतना ही कम समय लगता है. ये बात आज सचिन तेंदुलकर और रेखा को समझ में आ रही होगी. आज राज्यसभा में सचिन तेंदुलकर और रेखा पर सवाल उठाए गये हैं और इसकी वजह है इन दोनों की Attendence.राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने सांसद सचिन तेंदुलकर और रेखा की संसद से Bunk मारने वाली आदत पर ऐतराज़ जताया और कहा कि अगर इन दोनों सांसदों की संसद में दिलचस्पी नहीं है, तो ये दोनों इस्तीफा क्यों नहीं दे देते.

5 साल पहले जब सचिन तेंदुलकर और रेखा को राज्यसभा के लिए Nominate किया गया था तो पूरे देश ने इस फैसले का स्वागत किया था. खासतौर पर सचिन तेंदुलकर से पूरे देश को उम्मीद थी कि वो देश में खेलों के हालात सुधारने के लिए बहुत कुछ करेंगे. लेकिन सचिन तेंदुलकर ने ये उम्मीदें तोड़ दीं. राज्यसभा की Website के मुताबिक इस साल संसद के बजट सत्र में सचिन तेंदुलकर ने एक दिन हिस्सा लिया है. यही हाल रेखा का भी है. वो भी बजट सत्र में सिर्फ एक दिन संसद में पहुंची हैं.

आपको बता दें कि बजट सत्र 31 जनवरी 2017 से शुरू हुआ था. पिछले साल यानी वर्ष 2016 में भी सचिन सिर्फ 9 बार राज्यसभा में हाज़िर रहे थे. सचिन तेंदुलकर ने सांसद के तौर पर पिछले 5 वर्षों में सिर्फ 22 सवाल पूछे हैं. सचिन तेंदुलकर नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद सिर्फ 20 दिन संसद में दिखाई दिए हैं. सचिन तेंदुलकर के करीब 60 महीने पुराने संसदीय जीवन में. राज्यसभा में उनकी उपस्थिति सिर्फ 8 प्रतिशत दर्ज की गई है. यानी वो सिर्फ 23 दिन राज्यसभा में आए हैं. कुल मिलाकर क्रिकेट की दुनिया का भगवान. संसद में ज्यादातर अदृश्य ही रहा है. जाहिर है राजनीति के जरिये देशसेवा की पिच पर सचिन तेंदुलकर क्लीन बोल्ड हो गये हैं.
 
वैसे अपने जमाने की मशहूर Actress रेखा भी इस मामले में सचिन का साथ पूरी शिद्दत से निभा रही हैं. सचिन तेंदुलकर के साथ ही रेखा को भी अप्रैल 2012 में राज्यसभा सदस्य के तौर पर नामांकित किया गया था. पिछले वर्ष रेखा सिर्फ तीन बार संसद की कार्यवाही में शामिल हुई थीं. रेखा नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद सिर्फ 10 बार राज्यसभा में आई हैं. और कुल मिलाकर रेखा अपने संसदीय करियर में अब तक सिर्फ 16 बार राज्यसभा में दिखाई दी हैं. यानी राज्यसभा में उनकी Attendance सचिन तेंदुलकर से भी कम है. 

आपको बता दें कि इस वक्त राज्यसभा में नामांकित सांसदों की संख्या 12 हैं. अगर इनमें से सचिन और रेखा को हटा दिया जाए. तो बाकी के सांसदों की राज्यसभा में उपस्थिति कम से कम 61 प्रतिशत है. सचिन की तरह खेलों की दुनिया से आने वाली Boxer मैरी कॉम ने राज्यसभा की 61 प्रतिशत कार्यवाहियों में हिस्सा लिया है. जबकि संभा जी छत्रपति नामक राज्यसभा सांसद की उपस्थिति 100 प्रतिशत है. संभा जी छत्रपति कोल्हापुर के शाही खानदान के वारिस हैं.

सचिन तेंदुलकर, क्रिकेट से रिटायर हो चुके हैं. रेखा भी अब फिल्मी दुनिया में ज्यादा Active नहीं है. ऐसे में ये दोनों राज्यसभा में उपस्थित क्यों नहीं होते. ये सवाल अब ज़ोर शोर से उठ रहे हैं. राजनीति की दुनिया में अब इन दोनों पर तीखे सवालों के बाउंसर फेंके जा रहे हैं. सचिन तेंदुलकर और रेखा अपने अपने क्षेत्रों के दिग्गज हैं. हम इन दोनों का पूरा सम्मान करते हैं. लेकिन सम्मान के साथ साथ जिम्मेदारियां भी आती हैं. और हमें लगता है कि सांसद के तौर पर इन दोनों ने अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभाया है. 

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वैसे आपको बता दें कि संविधान की धारा 80 के तहत राष्ट्रपति को राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार होता है. ये सदस्य विज्ञान. कला, खेल और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों के बड़े नाम होते हैं. इन सदस्यों का कार्यकाल भी 6 साल का होता है. राज्यसभा में सांसदों की कुल संख्या 243 है। वर्ष 1952 से अबतक करीब 133 लोगों को राज्यसभा में मनोनीत किया जा चुका है. इनमें से कुछ नाम ऐसे हैं जिनसे सचिन तेंदुलकर और रेखा, राज्यसभा में Active रहने की सीख ले सकते हैं. 

वर्ष 1952 में अपने भाषण में मशहूर कलाकार पृथ्वीराज कपूर ने ‘राष्ट्रीय थियेटर’ शुरू करने की बात कही थी. वर्ष 1953 में मशहूर नर्तकी रुक्मिणी देवी की पहल पर जानवरों पर अत्याचार रोकने के लिए एक विधेयक पेश किया गया था. 1973 में कार्टूनिस्ट अबू अब्राहम ने सूखा पीड़ित इलाक़ों की समस्याओं को संसद में ज़ोर-शोर से उठाया था. 1980 में भारत के जाने माने लेखकों में से एक आर.के नारायण ने संसद में अपने पहले भाषण में भारी-भरकम स्कूल बैग को हटाने की मांग की थी. ताकि बच्चों के कंधों से बोझ कुछ कम हो सके.

जबकि सांसद के तौर पर रेखा और सचिन ने कभी किसी बहस में हिस्सा नहीं लिया और ना ही कभी कोई Private Member Bill पेश किया. प्राइवेट मेंबर बिल उन सांसदों द्वारा लाया जाता है,जो मंत्री नहीं होते हैं. इसलिए इसे प्राइवेट मेंबर बिल कहा जाता है. इन उदाहरणों के आईने में सचिन तेंदुलकर और रेखा की Attendance देखकर लगता है कि उनको राज्यसभा के लिए मनोनीत करना सही फैसला नहीं था.

राज्यसभा में सांसदों की उपस्थिति का राष्ट्रीय औसत 78 प्रतिशत है। जबकि सचिन और रेखा के मामले में ये औसत सिर्फ 8 प्रतिशत और 5 प्रतिशत है. अगर सचिन तेंदुलकर और रेखा चाहें तो वो जावेद अख्तर से भी प्रेरणा ले सकते हैं. राज्यसभा में जावेद अख्तर की Attendance 53 प्रतिशत रही है. वर्ष 1997 से 2003 के दौरान राज्यसभा सांसद रह चुकीं शबाना आज़मी ने संसद की 170 बैठकों में से 113 में हिस्सा लिया था. यानी उनकी हाज़िरी 66 फीसदी से ज़्यादा थी. राज्यसभा के मनोनीत सांसद रहते हुए दारा सिंह की Attendance 57 फीसदी थी. राज्यसभा सांसद रहते हुए फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल की Attendance 74 प्रतिशत थी. इस मामले में लता मंगेशकर का रिकॉर्ड बहुत खराब था. वर्ष 1999 से 2005 तक राज्यसभा सांसद रहीं लता मंगेशकर ने सिर्फ 6 बैठकों में हिस्सा लिया था. फिल्म निर्देशक मृणाल सेन भी 170 में से सिर्फ 30 बैठकों में ही शामिल हुए थे.

आज राज्यसभा में भी जब सचिन और रेखा की Attendance शॉर्ट होने का सवाल उठा तो उपसभापति पी.जे कुरियन ने सार्वजनिक तौर पर जानकारी दी कि सचिन तेंदुलकर 9 मार्च से शुरू हुए बजट सत्र के दूसरे हिस्से से लेकर अब तक संसद में दिखाई नहीं दिए हैं और यही हाल रेखा का भी है. वैसे जब सांसद नरेश अग्रवाल ने रेखा और सचिन तेंदुलकर की शिकायत की तो उप सभापति ने उन्हें एक सुझाव दिया. पीजे कुरियन ने कहा कि वो चाहें तो इन दोनों सांसदों को चिट्ठी लिखकर राज्यसभा में आने का आग्रह कर सकते हैं. वैसे आपको जानकारी दे दें कि सदन में अनुपस्थित रहने वाले सांसदों के खिलाफ संविधान के Article 104 के मुताबिक कार्रवाई होती है. Article 104 में कहा गया है कि अगर कोई सांसद बिना बताए लगातार 60 बैठकों तक सदन में नहीं आता तो उसकी सीट को खाली मान लिया जाता है.

जिसके बाद उस सीट पर दूसरे सदस्य को मनोनीत किया जा सकता है. जब से सचिन तेंदुलकर और रेखा सांसद बने हैं. तब से अब तक राज्यसभा की 350 बैठकें हो चुकी हैं. और इस दौरान कुछ दुर्लभ मौकों पर ही सचिन तेंदुलकर और रेखा राज्यसभा में दिखाई दिए हैं. यहां हम ये साफ करना चाहते हैं कि हम भी सचिन तेंदुलकर के खेल और रेखा की अदाकारी के प्रशंसक हैं. ये दोनों ही लोग अपने अपने क्षेत्र के दिग्गज हैं. लेकिन हर कोई हर भूमिका को ठीक से नहीं निभा सकता. सचिन तेंदुलकर बहुत अच्छे और महान क्रिकेटर हैं. लेकिन एक सांसद के तौर पर उन्हें अच्छा नहीं कहा जा सकता. इसी तरह रेखा बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं. लेकिन उन्हें बहुत अच्छा सांसद नहीं कहा जा सकता.

आपको याद होगा कि सचिन तेंदुलकर एक ज़माने में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान थे. लेकिन उन्होंने अपने खेल पर फोकस करने के लिए कप्तान का पद छोड़ दिया था. वो चाहते तो एक सांसद होने की ज़िम्मेदारी से भी आज़ाद हो सकते थे. क्योंकि किसी ज़िम्मेदारी को ठीक से ना निभा पाने से तो अच्छा है कि उसे छोड़ दिया जाए और अपनी प्रतिभा के मुताबिक काम किया जाए. रेखा ने भी अपने करियर में कई फिल्मों के ऑफर को ठुकराया होगा. क्योंकि उन्हें लगा होगा कि फिल्म में उनकी भूमिका ठीक नहीं है. लेकिन सवाल ये है कि क्या उन्हें कभी ये लगा कि संसद में उनकी भूमिका ठीक नहीं है?

हमें उम्मीद है कि सचिन और रेखा इन बातों पर विचार करेंगे. हमें उनकी काबिलियत पर कोई शक नहीं हैं. और हम उनके प्रशंसक हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम जायज़ सवालों को नहीं उठाएंगे. हमें लगता है कि सचिन तेंदुलकर और रेखा को इस बात पर विचार करना चाहिए कि अगर उनकी जगह कोई और योग्य व्यक्ति राज्यसभा में आए. तो देश का कितना फायदा हो सकता है?

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