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Analysis, No subsidy for Haj Yatra

भारत सरकार ने आज (मंगलवार, 16 जनवरी) एक ऐतिहासिक फैसला लिया है. आज हज यात्रा के लिए मिलने वाली सब्सिडी को खत्म कर दिया गया है. भारत में इस वर्ष से हज यात्रियों को सब्सिडी नहीं मिलेगी. वैसे तो इस फैसले का असर 1 लाख 75 हज़ार मुस्लिम हज यात्रियों पर पड़ेगा.. लेकिन इसके परिणाम दूरगामी होंगे. आज हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि हमारे देश में सब्सिडी की राजनीति कब खत्म होगी. अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने आज (मंगलवार, 16 जनवरी) इसकी घोषणा की. मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि भारत सरकार हज सब्सिडी को ख़त्म करके… बिना तुष्टीकरण किए.. अल्पसंख्यकों का कल्याण और सामाजिक विकास करना चाहती है. 

वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को वर्ष 2022 तक हज की सब्सिडी खत्म करने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बारे में भी हम आपको आगे विस्तार से बताएंगे. भारत सरकार ने कहा है कि हज यात्रा की सब्सिडी खत्म करने से जो धनराशि बचेगी उसका इस्तेमाल अल्पसंख्यक लड़कियों की शिक्षा और विकास के लिए किया जाएगा. 

दिसंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हज यात्रा से जुड़ा हुआ एक और ऐतिहासिक फैसला लिया था. भारत सरकार ने बिना मेहरम यानी परिवार के पुरुष सदस्य के बिना महिलाओं की हज यात्रा को भी मंज़ूरी दे दी थी. दिसंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो Show मन की बात में भी इसका ज़िक्र किया था. 

आज आपको ये भी समझना चाहिए की हज सब्सिडी क्या होती है ?
हज सब्सिडी… का मतलब है.. हज यात्रा पर जाने के लिए भारत के मुसलमानों को दी जाने वाली रियायत. भारत से सऊदी अरब जाने के लिए हवाई जहाज के किराये पर कुल जितना पैसा खर्च होता है उसमें सरकार Subsidy देती थी. 

Research के दौरान हमें ऐसी जानकारी मिली है… कि हज यात्रियों को आर्थिक मदद देने की शुरुआत आज़ादी से भी पहले हुई थी.. वर्ष 1932 में ब्रिटिश सरकार The Port Haj Committees Act लेकर आई थी. इस Act के तहत एक हज कमेटी बनाई गई. जिसकी मदद सरकार करती थी. जानकार ये मानते हैं कि ऐसा देश को बांटने की राजनीति के तहत किया गया. इसके बाद आज़ाद भारत में 1959 में कानून पास करके.. हज कमेटी का गठन किया गया था. हालांकि सब्सिडी 1954 से ही मिलनी शुरू हो गई थी. उस वक़्त भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे. 

8 मई 2012 को सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस रंजना देसाई ने हज सब्सिडी पर भारत सरकार को एक आदेश दिया था. इस आदेश में कहा गया था कि सरकार अगले 10 वर्षों में यानी वर्ष 2022 तक हज की सब्सिडी को खत्म करे और इससे बचने वाले पैसे को अल्पसंख्यकों के कल्याण और सामाजिक विकास के लिए खर्च किया जाए. 

इस आदेश के बाद केंद्र सरकार ने हज की सब्सिडी में कटौती शुरू कर दी थी. देश में 21 शहरों से हज यात्री.. सऊदी अरब जा सकते हैं. और सरकार हर साल हवाई यात्रा का किराया तय करती है. इसके बाद जो किराया लगता है वो सरकार सब्सिडी के रूप में देती है. ये सब्सिडी हर शहर के लिए अलग-अलग होती है. 

वर्ष 2012 में 836 करोड़ रुपए की हज सब्सिडी दी गई गई थी 
वर्ष 2013 में 683 करोड़ रुपए 
वर्ष 2014 में 577 करोड़ रुपए  
वर्ष 2015 में 529 करोड़ रुपए  
वर्ष 2016 में 405 करोड़ रुपए 
वर्ष 2017 में हज सब्सिडी को घटाकर 200 करोड़ तक दिया गया 
और अब 2018 में सब्सिडी खत्म हो गई है

वर्ष 2012 के फैसले का संज्ञान लेते हुए 31 जनवरी 2017 को केंद्र सरकार ने हज नीति की समीक्षा करने के लिए एक समिति बनाई थी. इस समिति का अध्यक्ष, रिटायर्ड IAS अफसर.. अफज़ल अमानुल्ला को बनाया गया था. इस समिति को वर्ष 2018 से वर्ष 2022 तक की हज नीति की रूपरेखा तैयार करनी थी. और इसी समिति के सुझावों पर ये फैसला लिया गया है.

इस विषय को पूरी तरह समझने के लिए आपको कुछ मूलभूत जानकारियां होनी चाहिएं. हर वर्ष दुनिया भर के 20 से 30 लाख लोग, हज के लिए सऊदी अरब के मक्का में इकट्ठा होते हैं. हज को दुनिया भर में इस्लामिक आस्था का केंद्र बिंदु माना जाता है. यहां इस्लाम धर्म के बारे में भी कुछ संक्षिप्त जानकारियां आपको दे देते हैं क्योंकि बहुत से दर्शकों को शायद इसके बारे में पता नहीं होगा

इस्लाम के 5 बुनियादी आधार हैं, जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज शामिल हैं. 

इनमें कलमा पढ़ना यानी ख़ुदा की बादशाहत और मुहम्मद को उनका पैंगबर मानना है. 
नमाज़ का अर्थ है कि रोज़ पांच बार ख़ुदा की इबादत करना.
रोज़ा का अर्थ है कि रमज़ान के पवित्र महीने में उपवास रखना
ज़कात करने का अर्थ है कि अपनी कमाई का एक हिस्सा गरीबों को दान करना
और हज करना यानी मक्का-मदीना की धार्मिक यात्रा करना 

इस्लामी कैलेंडर के 12वें महीने में हज की धार्मिक यात्रा होती है. इस्लाम में कहा गया है कि हर मुसलमान जो हज का ख़र्चा उठा सकता है और विवश नहीं है, उसे जीवन में एक बार हज के लिए ज़रूर जाना चाहिए. हालांकि हज करना ज़रूरी नहीं हैं.. Mandatory नहीं है. 

अब हज के बारे में भी हम आपको विस्तार से जानकारी दे देते हैं…

हज पांच दिनों की धार्मिक यात्रा होती है, जिसमें मक्का और उसके आसपास इस्लामिक आस्था की कई जगहों पर 40 किलोमीटर से ज़्यादा का सफर तय करना होता है. इस्लामिक आस्था है कि ये वही रास्ता है जिस पर कभी पैगंबर मुहम्मद साहब चले थे. हज की पहली धार्मिक विधि Ihram (इहरम) होती है, जिसमें मक्का की सीमा में आने से पहले तीर्थयात्री को कुछ निश्चित नियमों के साथ सादे कपड़े पहनने होते हैं. इसके बाद तीर्थयात्री दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद अल-हरम में पहुंचते हैं, जहां वो मस्जिद के अंदर काबा की 7 बार परिक्रमा करते हैं. इस्लाम में काबा को सबसे उच्च स्थान प्राप्त है और इसे पृथ्वी पर ख़ुदा का घर माना जाता है.

आपने नोट किया होगा कि हमारे देश में.. सब्सिडी को एक बहुत बड़े राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है.. और देश के लोगों की मूल ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. विडंबना ये है कि अगर कोई बुज़ुर्ग व्यक्ति अस्पताल में अपना इलाज करवाना चाहे.. तो शायद वहां उसे सब्सिडी नहीं मिलेगी.. लेकिन अगर वही व्यक्ति धार्मिक यात्रा पर जाना चाहे.. तो उसे तुरंत सब्सिडी मिल जाती है. ये एक चुभने वाला विरोधाभास है. सब्सिडी के नाम पर भारत में तुष्टीकरण की राजनीति का एक बहुत लंबा दौर चला है. इस राजनीति के तहत लोगों को वोटबैंक बना दिया गया.. और उन्हें खुश करने के लिए सब्सिडी बांटी गई. लेकिन धीरे धीरे ये राजनीति पुरानी हो गई.. अब भारत के लोगों को नये युग में जाने के लिए सब्सिडी की राजनीति को नज़रअंदाज़ करना होगा .. हर साल सरकारें बड़े फक्र से ये बताती हैं कि हमने इतने लोगों को सब्सिडी दी,, जबकि कसौटी ये होनी चाहिए.. कि सरकारों ने कितने लोगों को सक्षम बनाया… सरकारों को ये बताना चाहिए कि उन्होंने कितने लोगों को इतना सक्षम बना दिया कि.. अब उन्हें सब्सिडी देने की ज़रूरत ही नहीं है.

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बार्डर पर नाकाम पाकिस्तान का नया पैंतरा, भारत को अशांत करने के लिए इस आतंकी संगठन को कर रहा जिंदा

नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर में लगातार मुंह की खाने के बाद भारत को अशांत करने के लिए पाकिस्तान नई तरकीब पर काम कर रहा है. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी (ISI) एक बार फिर से खालिस्तान मूवमेंट को जिंदा करने की कोशिश में जुटा है. खुफिया एजेंसी की ओर से गृह मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि सीमा पर भारत की चौकसी और भारतीय सेना की ओर से दिए जाने वाले मुंहतोड़ जवाब से पाकिस्तान घबरा गया है. वह चाहकर भी जम्मू कश्मीर सहित देश अन्य हिस्सों में आतंकी भेजकर अपने मंसूबों का पूरा नहीं कर पा रहा है. भारत में अशांति फैलाने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI ने प्लान बनाया है कि वह पंजाब में लगभग खत्म हो चुके खालिस्तान मूवमेंट को जिंदा कर दे. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ISI के अधिकारियों ने हाल ही में खालिस्तान मूवमेंट के कुछ नेताओं से विदेशों में मुलाकात की थी. इस गुप्त मुलाकात में ISI ने खालिस्तान की मांग करने वाले नेताओं को आश्वासन दिया है कि वे दोबारा से भारत को परेशान करें. इसमें पाकिस्तान उसकी हर संभव मदद करेगा.

कनाडा में रहते हैं खालिस्तान की मांग करने वाले विद्रोही
सूत्रों के मुताबिक ISI ने खालिस्तान मूवमेंट के नेताओं को आश्वासन दिया है कि वह हथियार, धन और गुप्त सूचनाएं मुहैया कराने में उनकी मदद करेगा. हालांकि ये स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस ISI के अफसरों और खालिस्तान मूवमेंट के नेताओं के बीच हुई इस बैठक का नतीजा क्या निकला है. भारत के लिहाज से इस मुलाकात को अहम माना जा रहा है. खालिस्तान मूवमेंट को लेकर भारत सरकार लंबी लड़ाई लड़ाई लड़ चुकी है.

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यूं तो कनाडा में करीब 13 लाख से सिख रहते हैं. यहां के कई इलाके ऐसे हैं जिन्हें देखकर पंजाब के किसी जिले में होने जैसा लगता है. इस आबादी में एक छोटा तबका उन लोगों का भी है, जो भारत के पंजाब प्रांत को अलग देश खालिस्तान बनाने की इच्छा रखते हैं. वे सदैव भारत विरोधी हरकतों में लिप्त रहते हैं. हालांकि ऐसे लोगों की तादाद इतनी कम है कि वे दोबारा से इस आंदोलन को जिंदा नहीं कर पा रहे हैं. अब पाकिस्तान इन्हें उकसा रहा है कि वे दोबारा से भारत को अशांत करें.

ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद देश से उखड़े थे खालिस्तान विद्राहियों के पांव
कनाडा में सिख ना सिर्फ़ एक समुदाय के रूप में बेहद मज़बूत हैं बल्कि देश की राजनीति की दिशा को भी तय कर रहे हैं. कनाडा के सिख समुदाय का एक और तार भी है जो कि उन्हे अलग खालिस्तान की अवधारणा से जोड़ता है. इस समुदाय का एक गुट खुद को खालिस्तान समर्थक कहता है. बताया जाता है कि 1984 में स्वर्ण मंदिर से भिंडरावाले के समर्थक आतंकियों को निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में इसे अंजाम दिया गया था. जिस तरह ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 के सिख दंगे भारत समेत पूरी दुनिया में सिखों के लिए मुद्दे हैं उसी तरह कनाडा में रह रहे सिखों के लिए भी ये बड़े मुद्दे हैं.

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माना जाता है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला लेने के लिए खालिस्तान के विद्राहियों ने मांट्रियाल से नई दिल्ली जा रहे एयर इंडिया के विमान कनिष्क 23 जून 1985 को हवा में ही बम से उड़ा दिया गया था. हमले में 329 लोग मारे गए थे, जिनमें से अधिकांश भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक थे. सिख अलगाववादी गुट बब्बर खालसा के सदस्य इस हमले के मुख्य संदिग्धों में शामिल थे. ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद लगभग पूरे भारत से खालिस्तान समर्थकों के पांव उखड़ गए थे. अब भारत को एक बार फिर से अशांत करने के लिए पाकिस्तान खालिस्तान के आतंकियों को उकसा रहा है. 

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UP: 25 हजार करोड़ में बनेगा देश का सबसे लंबा एक्सप्रेस वे, जानें क्या है खासियत

लखनऊ. अखिलेश सरकार ने लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे बनवाया था, अब योगी सरकार लखनऊ से गाजीपुर तक देश का सबसे लंबा एक्सप्रेस वे बनाने की तैयारी कर रही है. इसे ‘पूर्वांचल एक्सप्रेस वे’ नाम दिया गया है. लखनऊ से गाजीपुर के 353 किलोमीटर लंबी इस रोड परियोजना की लागत करीब 25 हजार करोड़ रुपए आने का अनुमान है. पूर्वांचल एक्सप्रेस वे लखनऊ, बाराबंकी, फैजाबाद, अंबेडकरनगर, अमेठी, सुल्तानपुर, आजमगढ़, मऊ और गाजीपुर से होकर गुजरेगा.

यह एक्सप्रेस वे 6 लेन का होगा, जिसे बाद में 8 लेन तक बढ़ाया जा सकता है. इसकी मदद से लखनऊ से गाजीपुर की यात्रा 4 घंटे में पूरी होगी. जानकारी के मुताबिक पूर्वांचल एक्सप्रेस वे को अयोध्या, इलाहाबाद, वाराणसी और गोरखपुर से लिंक रोड से जोड़ा जाएगा. लिंक रोड का निर्माण यूपी का लोकनिर्माण विभाग या NHAI कर सकता है. बजट सत्र के बाद इसका निर्माण कार्य शुरू होने की संभावना है. करीब ढाई साल में इसे बनाने का लक्ष्य रखा गया है. 

प्रति किलोमीटर लागत 70 करोड़ रुपए 
योगी सरकार जिस पूर्वांचल एक्सप्रेव को बनवाने जा रही है वह लखनऊ से गाजीपुर के बीच 353 किलोमीटर का होगा, जिसको अखिलेश यादव ने ही प्रस्तावित किया था. इस एक्सप्रेस वे के निर्माण में कुल 24627 करोड़ रुपए की लागत आएगी, यानि प्रति किलोमीटर एक्सप्रेस वे के निर्माण में कुल 70 करोड़ रुपए का खर्च आएगा. वहीं लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे जिसकी कुल लंबाई 302 किलोमीटर है इसके निर्माण में प्रति किलोमीटर की लागत 50 करोड़ रुपए थी. ऐसे में इस लिहाज से योगी सरकार में बनने वाले लखनऊ-गाजीपुर के एक्सप्रेस वे की प्रति किलोमीटर की लागत 20 करोड़ रुपए अधिक है.

… तो इसलिए बढ़ी लागत
एक्सप्रेस वे के निर्माण में बढ़ी लागत की बड़ी वजह है भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों को अधिक मूल्य का भुगतान. यूपी सरकार के एक अधिकारी का कहना है कि बढ़ी कीमत की वजह भूमि अधिग्रहण में अधिक मूल्य दिए जाना है. उन्होंने बताया कि लखनऊ-आगरा एक्सप्रे वे में भूमि अधिग्रहण के लिए तकरीबन 2900 करोड़ रुपए खर्च किए गए, जबकि पूर्वांचल एक्सप्रेव वे के लिए भूमि अधिग्रहण में कुल 7058 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे. अधिकारी का कहना है कि यूपी की जमीन काफी उपजाऊ है, लिहाजा सरकार ने किसानों को इसकी अच्छी कीमत देने का फैसला लिया है.

अखिलेश के एक्सप्रेस वे पर लगाए थे भ्रष्टाचार के आरोप
लखनऊ से गाजीपुर के बीच भारत का सबसे ये सबसे लंबा एक्सप्रेस होगा. यूपी में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने अखिलेश यादव पर आरोप लगाया था कि उन्होंने जनता के पैसों का दुरुपयोग किया है. भाजपा ने कहा था कि इस एक्सप्रेस वे के निर्माण में भ्रष्टाचार किया गया है और जब वह सत्ता में आएगी तो वह इसकी जांच कराएगी.

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कभी गुजरात में बड़ी ताकत हुआ करते थे तोगड़िया, यहां से उनके रुतबे में आई कमी!

मंगलवार सुबह अचानक प्रवीण तोगड़िया ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करते हुए अपने एनकाउंटर की साजिश रचे जाने के सनसनीखेज आरोप लगा डाले. उन्‍होंने इंटेलिजेंस ब्‍यूरो (आईबी) पर भी लोगों को धमकाने के आरोप लगाए.
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भारत में होगी कंप्यूटर COW की एंट्री, आम गाय से देती है 5 गुना ज्यादा दूध

यह एक आम गाय की तरह की हाड़-मांस की गाय है. अंतर बस पालन और पोषण का है

ज़ी न्यूज़ डेस्क
ज़ी न्यूज़ डेस्क | Updated: Jan 16, 2018, 11:33 AM IST

भारत में होगी कंप्यूटर COW की एंट्री, आम गाय से देती है 5 गुना ज्यादा दूध

इस गाय के भारत आने से मिल्क का प्रोडक्शन बढेगा (प्रतीकात्मक चित्र)

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CJI ने 7 संवैधानिक बेंच का गठन किया, विरोध करने वाले 4 जजों के नाम शामिल नहीं

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में अहम मामलों की सुनवाई के लिए प्रधान न्यायाधीन दीपक मिश्रा और चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों के बीच एक तरह से मतभेद उभरने के बीच शीर्ष अदालत ने सीजेआई की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के गठन का ऐलान कर दिया है. इस पीठ के गठन के बाद गौर करने वाली बात यह है कि कुछ दिनों पहले मीडिया को संबोधित करने वाले जजों को इसमें शामिल नहीं किया गया है.

17 जनवरी से होगी अहम मसलों पर सुनवाई
सोमवार को गठित की गई संविधान पीठ में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करने वाले चारों न्यायाधीशों- न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एम बी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ में से किसी का नाम पांच जजों की संविधान पीठ के सदस्यों के रुप में शामिल नहीं किया गया है. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में 17 जनवरी से कई अहम मुद्दों पर सुनवाई शुरू होनी है जिसके लिए संविधान पीठ का गठन किया गया है.सुप्रीम पांच न्यायाधीशों की पीठ में सीजेआई दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए के सीकरी, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं.

यह भी पढ़ें: ‘सुप्रीम’ विवाद: कोर्ट स्टाफ को बाहर निकालकर जजों ने की चाय पर चर्चा, AG बोले अब सब कुछ सामान्य

इन मामलों पर सुनवाई करेगी संवैधानिक पीठ
सोमवार की जारी की गई कार्यसूची के अनुसार पांच न्यायाधीशों की पीठ आधार कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले मामले और सहमति से वयस्क समलैंगिकों के बीच यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के फैसले को चुनौती देने से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में सुनवाई करेगी.

इन्हीं न्यायाधीशों ने पिछले साल 10 अक्तूबर से संविधान पीठ के विभिन्न मामलों में सुनवाई की थी. इनमें प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच टकराव का मामला भी है.

पीठ केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओें के प्रवेश पर रोक के विवादास्पद मुद्दे पर भी सुनवाई करेगी और इस कानूनी सवाल पर सुनवाई फिर शुरू करेगी कि क्या कोई पारसी महिला दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी के बाद अपनी धार्मिक पहचान खो देगी. संविधान पीठ अन्य जिन मामलों को देखेगी उनमें आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे किसी जनप्रतिनिधि के अयोग्य होने से संबंधित सवाल वाली याचिकाओं पर भी सुनवाई करेगी.

चीफ जसिस्टस पर उठाए थे सवाल
पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के चार सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश जे. चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसफ ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में मीडिया से बातचीत की थी. चारों जजों ने मीडिया के सामने आकर कोर्ट प्रशासन और चीफ जस्टिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए थे. बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस मुद्दे को सुलझाने की पहल की है. शनिवार शाम बार काउंसिल ने एक बैठक कर सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों से मिलने का फैसला किया. सभी जजों से चर्चा के बाद काउंसिल के पदाधिकारी उन चारों जजों से भी मुलाकात करेंगे जिन्होंने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाया था. 

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बार काउंसिल ने कहा सब कुछ सामान्य
बार काउंसिल आफ इंडिया
ने सोमवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों द्वारा प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने से उत्पन्न संकट आंतरिक तरीके से हल कर लिया गया है और ‘‘अब कहानी खत्म हो गई है.’’ बार काउंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के नेतृत्व में इस संगठन के सात सदस्यीय शिष्टमंडल ने रविवार को प्रधान न्यायाधीश सहित शीर्ष अदालत के 15 न्यायाधीशों मुलाकात की थी. उन्होंने सोमवार को बताया कि चार न्यायाधीशों द्वारा उठाए गए मसले ‘‘परिवार का अंदरूनी मामला था’’ जिसे सुलझा लिया गया है.

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CJI से मुलाकात पर संदेह
सोमवार को खबर आई थी कि चारों जज वापस अपने काम पर लौट गए हैं. सोमवार को सीजेआई के साथ एक बार फिर विरोध करने वाले चारों जज लाउंज में नजर आए. चारों जजों ने सुप्रीम कोर्ट ने बाकि जज और सीजेआई के साथ चाय पर चर्चा की. जिस वक्त सुप्रीम कोर्ट के जज चाय पर चर्चा कर रहे थे, उस वक्त कोर्ट से बाकि स्टॉफ को बाहर निकाल दिया गया था, लेकिन अब इस तरह की खबरों की पुष्टि नहीं जा रही है. 

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ZEE जानकारी: बांग्लादेश बॉर्डर से रोहिंग्या मुसलमानों की कराई जा रही है भारत में घुसपैठ

पश्चिम बंगाल की सीमा के साथ बांग्लादेश का करीब 2 हज़ार किलोमीटर लंबा…बॉर्डर लगा हुआ है. इनमें से कई इलाके ऐसे हैं जहां सुरक्षा के इंतज़ाम कमज़ोर हैं और घुसपैठ करवाने वाले लोग इसी का फायदा उठाते हैं.


Updated: Jan 16, 2018, 12:18 AM IST

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जल्लीकट्टू पर बैन हटने के बाद पहली मौत, 19 साल के युवक को सांड़ों ने कुचला

मदुरै: तमिलनाडु के मदुरै जिले के पलामेदु इलाके में 15 जनवरी को जल्लीकट्टू (सांड़ों को काबू करने का खेल) के दौरान 11 प्रतिस्पर्धी जख्मी हो गए, जिसमें से एक युवक की मौत हो गई. जल्लीकट्टू पर रोक हटने के बाद मौत का यह पहला मामला सामने आया है. तमिलनाडु के राजस्व मंत्री आर बी उदयकुमार ने इस कार्यक्रम का उद्घाटन किया, जिसमें करीब 1,000 सांड़ों और सैकड़ों खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. पलामेदु जल्लीकट्टू के आयोजन के लिए एक प्रसिद्ध स्थान है. जल्लीकट्टू के खेल में विजयी हुए प्रतिस्पर्धियों को आकर्षक पुरस्कार दिए गए. इसी तरह, खिलाड़ियों को मात देने वाले सांड़ों को भी पुरस्कृत किया गया.

पुलिस ने बताया कि करीब 1,200 जवानों की तैनाती कर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे. घायल हुए 11 खिलाड़ियों का इलाज तुरंत मेडिकल कैंप में कराया गया और फिर उन्हें घर भेज दिया गया. हालांकि घायलों में एक की मौत हो गई. मरने वाले युवक की उम्र 19 साल बताई जा रही है.

ये भी पढ़ें: जल्लीकट्टू प्रदर्शन : रजनीकांत, कमल हासन ने संयम बरतने की अपील की

बता दें कि तमिलनाडु में 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जल्लीकट्टू पर बैन लगा दिया था. लेकिन, 2017 में हुए प्रदर्शनों के बाद तमिलनाडु सरकार ने बिल पास कर जल्लीकट्टू को मंजूरी दी थी.

ये भी पढ़ें: जल्लीकट्टू के खिलाफ एनिमल वेलफेयर बोर्ड की अर्जी पर सुनवाई 30 को

Jallikattu
तमिलनाडु के मदुरै जिले के पलामेदु इलाके में जल्लीकट्टू का आयोजन. तस्वीर साभार: IANS

जल्लीकट्टू पर विवाद कब शुरू हुआ?
– एनीमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया ने जल्लीकट्टू को पशुओं पर क्रूरता बताया था. बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में इस पर बैन लगाने के लिए केस फाइल किया था. 
27 नवंबर 2010: SC ने शर्तों के साथ तमिलनाडु में जल्लीकट्टू मनाने के निर्देश दिए.
2011: मिनिस्ट्री ऑफ एन्वॉयरमेंट एंड फॉरेस्ट ने नोटिफिकेशन जारी किया कि इवेंट में बैल शामिल नहीं होंगे और इवेंट पर बैन लग गया. लेकिन, 2009 ने तमिलनाडु रेगुलेशन ऑफ जल्लीकट्टू एक्ट नं. 27 के तहत ये इवेंट जारी रही. 
7 मई 2014:SC ने तमिलनाडु सरकार के एक्ट को दरकिनार कर जल्लीकट्टू पर बैन लगा दिया. 
8 जनवरी 2016: मिनिस्ट्री ऑफ एन्वॉयरमेंट एंड फॉरेस्ट ने कुछ शर्तों के साथ जल्लीकट्टू को मंजूरी दी. 
14 जनवरी 2016: SC ने एनीमल वेलफेयर बोर्ड और PETA की पिटीशन पर जल्लीकट्टू पर बैन को जारी रखा. केंद्र के ऑर्डर पर स्टे लगा दिया.
8 जनवरी 2017: चेन्नई के मरीना बीच पर सैकड़ों लोगों ने जल्लीकट्टू पर बैन के विरोध में प्रदर्शन किया. ये विरोध पूरे तमिलनाडु में फैल गया.
12 जनवरी 2017: SC ने राज्य और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर बैन को बरकरार रखा. लेकिन, तमिलनाडु में कई जगह जल्लीकट्टू हुआ. केंद्र की रिक्वेस्ट पर SC ने जल्लीकट्टू पर अपना फैसला कुछ दिनों के लिए टाल दिया.
23 जनवरी 2017: तमिलनाडु के गवर्नर ने जल्लीकट्टू जारी रखने के लिए ऑर्डिनेंस इश्यू किया, जिस पर तमिलनाडु विधानसभा में बिल पास कर जल्लीकट्टू को प्रिवेंशन ऑफ क्रुएलिटी ऑफ एनिमल एक्ट (1960) से छूट दे दी.
इनपुट: भाषा

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आतंकवाद के खिलाफ एक सुर में बोले मोदी-नेतन्याहू, इजरायली रक्षा कंपनियों को भारत के लिए बुलावा

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार (15 जनवरी) को इजरायली रक्षा क्षेत्र की कंपनियों को भारत में स्थानीय कंपनियों के साथ मिलकर भारत में ही उत्पादन कार्य करने के लिये आमंत्रित किया. प्रधानमंत्री ने भारत यात्रा पर आए इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ महत्वपूर्ण सामरिक मुद्दों पर विस्तृत बातचीत की. इजरायली प्रधानमंत्री ने मोदी को ‘‘क्रांतिकारी नेता’’ बताया. दोनों देशों के बीच इससे पहले साइबर सुरक्षा और तेल एवं गैस सहित विभिन्न अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये. यह समझौते दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की विस्तृत बातचीत के बाद किये गये.

बातचीत के दौरान यरुशलम के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में भारत द्वारा इजरायल के खिलाफ मतदान करने का मुद्दा भी उठा. इस बारे में भारतीय अधिकारियों ने कहा कि दोनों पक्षों ने अपनी बात रखी. हालांकि, अधिकारियों ने कहा कि दोनों नेता इस बात पर सहमत थे कि भारत-इजरायल संबंध ‘‘किसी एक मुद्दे से तय नहीं होते हैं.’’ भारत ने यरूशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने के अमेरिका के फैसले के विरोध में संयुक्त राष्ट्र में पिछले महीने लाये गये प्रस्ताव के समर्थन में मत दिया था. भारत के साथ दुनिया के 127 अन्य देशों ने विरोध प्रस्ताव का समर्थन किया था.

भारत-इजरायल के रिश्ते नए शिखर पर, साइबर सुरक्षा सहित 9 अहम समझौतों पर करार

प्रधानमंत्री मोदी ने नेतन्याहू के साथ अपनी बातचीत को ‘‘व्यापक व गहन ’’ बताते हुये कहा कि उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों की प्रगति की समीक्षा की और इस बात पर सहमति जताई कि उनके बीच जो भी संभावनायें और अवसर दिखते हैं उनका लाभ उठाया जाना चाहिये. द्विपक्षीय बैठक के बाद आयोजित संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में मोदी ने कहा, ‘‘हम हमारे लोगों के जीवन को संवारने वाले क्षेत्रों में सहयोग के मौजूदा स्तंभों को और मजबूत बनायेंगे. इन क्षेत्रों में कृषि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी और सुरक्षा के क्षेत्र है. …. रक्षा क्षेत्र में मैंने इजरायली कंपनियों को भारत की उदार एफडीआई नीति का लाभ उठाने के लिये आमंत्रित किया है ताकि वे हमारी कंपनियों के साथ मिलकर भारत में और भी ज्यादा उत्पादन करें.’’

मोदी-नेतन्याहू वार्ता के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य में कहा गया है कि दोनों नेताओं ने आतंकवाद में लगे और लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ काम कर रहे संगठनों सेवैश्विक शांति व सुरक्षा के लिए बढ़ रहे खतरों परविचार किया. उन्होंने इस बात को दोहराया कि आतंकवाद को किसी भी तरह से जायज नहीं कहा जा सकता. संयुक्त वक्तव्य में कहा गया है कि उन्होंने आतंकवादियों, आतंकवादी संगठनों, आतंकवाद को प्रायोजित, प्रोत्साहित और उनका वित्तपोषण करने वालों, आतंकवादियों और उनके संगठनों को आश्रय देने वालों के खिलाफ कठोर उपाय करने कीजरूरत पर बल दिया.

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संवाददाता सम्मेलन में नेतन्याहू ने कहा, ‘‘भारत और इजरायल के लोग आतंकवादी हमलों के दर्द को अच्छी तरह से समझते हैं. मुंबई में हुआ भयानक आतंकवादी हमला हमें याद है, हमने उसका जवाब दिया, कभी ऐसे हमलों के आगे नहीं झुके.’’ वक्तव्य में कहा गया है कि दोनों नेताओं ने इस बात पर भी गौर किया कि आंतरिक और सार्वजनिक सुरक्षा पर गठित संयुक्त कार्य समूह की अगली बैठक फरवरी 2018 में होगी. उन्होंने साइबर सुरक्षा सहित आतंकवाद का मुकाबला करने के क्षेत्र में होने वाले वृहद सहयोग की महत्व को दोहराया.

करोड़ों डॉलर की इजरायली मिसाइल स्पाइक के सौदे को लेकर बातचीत के बारे में एक सवाल काविदेश मंत्रालय में सचिव (आर्थिक संबंध) विजय गोखले ने सीधा कोईजवाब नहीं दिया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में सहयोग पर विचार विमर्श हुआ. उन्होंने किसी सौदे के बारे में कुछ नहीं कहा. रक्षा सहयोग के मुद्दे पर वक्तव्य में कहा गया है कि दोनों प्रधानमेंत्रियों ने प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के साथ साथ संयुक्त शोध एवं विकास के क्षेत्र में भागीदारी और संयुक्त उद्यम तथा संयुक्त विनिर्माण जैसे नये व्यावसायिक तौर तरीके विकसित करने को महत्वपूर्ण बताया. इस संबंध में दोनों नेताओं ने अपने अपने रक्षा मंत्रालयों से इस साल बातचीत और विचार विमर्श करने को कहा जिसमें सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र को भी सक्रिय रूप से भागीदार बनाया जा सके.

(इनपुट एजेंसी से भी)

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ज़ी न्यूज़ डेस्क | Updated: Jan 15, 2018, 07:06 PM IST

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